शोर के बाद की खामोशी: एक शहर की सच्चाई
इंट्रोडक्शन:-
एक शांत शहर में अचानक बदलाव शुरू हुआ। हर शनिवार रात को एक खून होने लगा और मीडिया ने इसे सनसनी बना दिया। पुलिस की जांच से ज्यादा न्यूज़ चैनलों की आवाज़ गूंजने लगी। एक निर्दोष आदमी श्याम को मीडिया ने कातिल बना दिया। लेकिन असली कातिल सामने आया — उसका मकसद सिर्फ खून करना नहीं था, बल्कि मीडिया को यह सिखाना था कि बिना सबूत किसी को अपराधी मत बनाओ। यह कहानी बताती है कि कैसे शोर सच्चाई को दबा देता है और कभी-कभी खामोशी ही सबसे बड़ा न्याय बन जाती है।
एक आम सा दिखने वाले शहर में कुछ बदलने लगा।शाम तक ये शहर बिल्कुल शांत था।पर उस शनिवार की रात को इस शहर में किसी का खून हुआ। लोगों को कुछ ज्यादा फर्क नहीं पड़ा।लगा, जैसे लोग सोये हुए हो। लेकिन पुलिस?उस खून की जांच में लग गयी। खून के समय उस सड़क पर एक आदमी श्याम दिखाई दिया।रात के 2:00 बजे के आसपास।पुलिस ने उसे ढूंढा और उससे पूछ्ताछ की।वो सीधा साधा दिखने वाला आदमी बेकसूर था।रात को अचानक उसके पड़ोसी की तबियत खराब हो गई थी इसलिए वो रात के समय रिक्शा ढूंढ रहा था।पुलिस ने अपनी जांच में उसके बयान को सही पाया।और 7 दिन बाद फिर एक खून हुआ। पुलिस पहले खून को ठीक से जांच भी नहीं कर पा रही थी और दूसरा खून हो गया।और फिर तीसरा इस शहर की शांति को मानो जैसे किसी की नजर लग गई।हर शनिवार रात को एक खून होने लगा।शुरू की दो मौतों में तो पुलिस और लोगों को ये एक आम घटना लगी।और लोग अपने काम में लग गए।लेकिन तीसरी मौत ने पूरे शहर को हिलाकर रख दिया। क्योंकि अब तक पांच मौतें हो चुकी थी।हर न्यूज़ चैनल सोशल मीडिया पर अचानक हो रही मौतों की ही बाते होती।चारो तरफ डर का माहौल बन गया।लेकिन शहर में ज्यादा खौफ मीडिया ने फैला दिया।सभी न्यूज़ चैनलों को एक न्यूज मसाला मिल गया इन मौतों से।सभी न्यूज़ चैनल पर मौतों का नाटकय रूप दिखाया जाने लगा।सभी न्यूज़ चैनल की टीवी स्क्रीन लाल रंग से चमक रही थी।शहर से ज्यादा स्टूडियो मौतों से गर्म थे। कोई भी न्यूज़ चैनल लगाकर देखो सब में एक ही बात चलती ‘’हमारे बीच कातिल ?’’क्या आप और आपका पड़ोसी सुरक्षित है?हर एंकर की आवाज चिल्ला रही थी।और सजा सुना रही थी।क्योंकि न्यूज़ चैनल के पास उस आदमी श्याम की फोटो और सीसीटीवी फुटेज थी।सभी टीवी स्क्रीन पे वो फोटो और खून के समय की सड़क को फुटेज दिखाई जाने लगीं।जिस समय श्याम उस सड़क पर था।श्याम की चुप्पी और सीधापन उसके लिए अपराध बन गयी थी। एकचैनल बोला जो ज्यादा खामोश होता है, वही सबसे खतरनाक होता है।दूसरा बोला।उसकी आँखों में डर नहीं यह एकसाइकोपैथ की पहचान है।कोई ये नहीं पूछ रहा था।श्याम के खिलाफ़ सबूत क्या है?क्योंकि टीआरपी को सबूत नहीं चाहिए होता।मीडिया की आवाज के आगे पुलिस भी डर गई।पुलिस जानती थी।मीडिया गलत है।लेकिन मीडिया तय कर चुका था श्याम कातिल है।मीडिया के शोर के आगे कानून की आवाज़ धीमी हो गई। कुछ देर बाद श्याम के घर के आगे नारेबाजी लगनी शुरू हो गई।पुलिस ने शहर में शांति व्यवस्था बनाने के लिए शाम को गिरफ्तार कर लिया।ये गिरफ्तारी थी, न्याय नहीं। कुछ दिन बाद।जब श्याम जेल में था एक और मौत हो गई।उसी पैटर्न उसी शांति के साथ क्योंकि कोई लड़ाई झगड़े और मारपीट के निशान नहीं थे। यह एक मशहूर न्यूज़ चैनल का एंकर था।जिसे हर कोई पहचानता था।और उसे उसके ही स्टूडियो में मार दिया गया था। सबको हैरानी हो गई। श्याम जेल में हो तो ये खून किसने किया?अब इस खून के साथ एक नोट भी था।बेकसूर का गुनहगार मत बनाओ, जो जितना चिल्लाएगा वो उतनी जल्दी मरेगा।अब इस मौत के बाद पहली बार कोई एंकर चिल्ला नहीं रहा था।स्टूडियो में लाइटें जल रही थी, लेकिन आवाज मंदी हो गई थी।ब्रेकिंग न्यूज़ चल रही थी। क्या मीडिया ट्रायल ने एक निर्दोष को फंसाया?शब्द बदल गए थे, लहजा नहीं।इस बार एक बड़े न्यूज़ चैनल सीनियर क्राइम की लाश नहीं मिली , साथ में एक संदेश भी था। स्टूडियो खाली था। कुर्सी सीधी रखी थी। माइ कौन था? कैमरा रिकॉर्ड कर रहा था सक्रीन पर एक लाइन चल रही थी शोर के बाद की खामोशी।और वो लिखा हुआ नोट भी जिसे स्क्रीन पर दिखाया जा रहा है।( “” बेकसूर का गुनहगार मत बनाओ, जो जितना चिल्लाएगा वो उतनी जल्दी मरेगा। ‘’’’)अब पुलिस की इन मौतों का पैटर्न साफ दिखाई देने लगा।क्योंकि आप तक जितनी भी मौतें हुई थीं, वे सब लोग अपनी तरफ से फैसला सुना रहे थे।बिना सच्चाई जानें।वो शोर मचा मचा कर। बेकसूर को फंसा रहे थे। लेकिन अब इस मौत के बाद खामोशी थी।सोशल मीडिया पर भी न्यूज़ चैनल पे भी।कोई फैसला नहीं सुना रहा था।सब डर गए थे, कहीं अगला नंबर उनका तो नहीं? पर ये न्यूज़ चैनल वाले कहामानने वाले थे। 2 दिन बाद स्टूडियो में फिर आवाज़ें गरमा गई।क्योंकि सभी न्यूज़ चैनल की टीआरपी नीचे आने लगी थी।और फिर शनिवार को छठी मौत।एक डिबेट सो ओनिल था अंकल चिल्ला था क्या हम भी खतरे में है? तभी उसके ईयरपीस में एक आवाज़ आई।फिर उस एंकर का चेहरा सफेद पड़ गया।कैमरा चलता रहा।मैं 2 दिन तक चैन से सोया।पहली बार मेरे सिर में आवाजें नहीं थी।मीडिया ने वही किया जो मैं चाहता था।लेकिन मीडियाकभी सुधर नहीं सकती। इस मीडिया की वजह से ही मैं एक सीधा सादा इंसान अब एक खूनी बन खूनी बन गया। इन के शोर के आगे मेरी सराफत दम तोड़ गई।मैं और मेरा परिवार इस शहर में शांति से रहते थे। मीडिया ने अपना फैसला सुनाकर मेरे परिवार और मेरी शांति को खत्म कर दिया।मीडिया ने शोर मचाया मुझे फिर मुझे कसूरवार बना दिया।मैं जिससे प्यार करता था मुझे उसी का एक खूनी बना दिया। कानून की नजर में तुम्हें मैं निर्दोष था।फिर मीडिया और समाज की नजर में नहीं।न्यूज़ चैनल के सुन सुन के लोगों ने हमारा वहाँ पर रहना भारी कर दिया।और हमें अपना घर छोड़कर जाना पड़ा। लेकिन हमारी बदनामी हम से पहले पहुंच रही थी।हम कई महीनों तक एक स्थान से दूसरे स्थान पर भटकते रहे। बदनामी के डर से मैंने सुसाइड करने की कोशिश की, लेकिन मैं उस में भी फैल हो गया।फिर कुछ दिन बाद देश में एक नई खबर आ गई।सभी न्यूज़ चैनल मीडिया पर वहीं खबरें चलने लगीं। लोग हमारी बात को भूल गए।मीडिया से बस बिना सोचे समझे बस बातों का तार का ताड़ बनाने लगती है।जैसे ही दोस्ती खबर मिली।मीडिया उसकी पीछे पड़ गयी।अब सभी जगह वही खबर चल रही थी।और पुरानी खबर दब गई। मीडिया फिर किसी बेकसूर को फंसा रही थी।वो तो सिर्फ अनुमान बताते हैं लेकिन लोग सच समझ गए हैं। उनका जीना हराम कर देते।वे बेकसूर होते हुए भी सजा पाते हैं।लोग बिना सोचे समझे सोशल मीडिया की बातों पर यकीन कर लेती है।और अपनी राय देने लगते।वे लोग सच्चाई तक जाने की कोशिश तक नहीं करती। स्क्रीन में दिखाई देता है, उसी को सच मानने लगते हैं। आज फिर किसी बेकसूर को मीडिया ने अपराधी मान लिया।और अपनी तरफ से फैसला सुनाने लगे।मीडिया के शोर के आगे कानून भी कुछ नहीं कर पाता।पर इस बार वह किसी और को अपने जैसा नहीं बनने दे सकता था।अब किसी भी न्यूज़ एंकर ने चिल्ला चिल्लाकर किसी को कानून से पहले अपराधी बनाया तो उसका मुँह बंद कर दिया जाएगा। सभी लोग उसे कातिल को लाइव सुन रहे थे।पुलिस जल्द ही उस स्टूडियो में पहुँच जाती है जहाँ पर कातिल का लाइव टेलीकास्ट हो रहा था।टीवी स्क्रीन पर एंकर का चेहरा था जो डर के मारे सफेद पड़ चुका था।और आवाज कातिल की चल रही थी।जो अपनी आपबीती बता रहा था।पुलिस नेवहाँ जाकर देखा तो वहाँ कोई नहीं था।माइक और कैमरा ओं था।एंकर कैमरे के सामने कुर्सी पर बैठा हुआ था।और माइक पर एक ऑडियो प्ले हो रहा था।जिसे वो कातिल लगाकर चला गया था। पुलिस उस कातिल को पकड़ नहीं पाई।जिससे शहर के अंदर डर का माहौल और ज्यादा गहरा गया। माहौल को शांत करने के लिए पुलिस ने सोशल मीडिया पर न्यूज़ दी की कातिल पकड़ा गया। पर इस बार किसी को दिखाया नहीं गया। कौन है वो?न्यूज़ के कुछ समय बाद ही एक ही पेन ड्राइव पुलिस स्टेशन पहुंचती।जिसमें कातिल की आवाज थी।तुम मुझे कभी नहीं पकड़ सकते।हाँ, जब तक किसी बेकसूर को नहीं फंसाया जाएगा तब तक मैं शांत हूँ।और इस शहर में किसी की मौत मेरी वजह से नहीं होगी।मीडिया किसी बेगुनाह पर अपना फैसला न थोपें।जब तक सच्चाई ना हो तो शांत रहे। उस दिन के बाद से मौतों का पैटर्न बंद हो गया।कातिल का मकसद पूरा हो गया था।उसने मीडिया को सबक सीखाना था, जो सीखा दिया।और शहर पहले की तरह शांत और बेखौफ़ हो गया।
FAQ:-
1. यह कहानी किस बारे में है?
यह कहानी मीडिया ट्रायल, निर्दोष को अपराधी बनाने और एक रहस्यमयी कातिल के बारे में है, जो मीडिया को सबक सिखाता है।
2. श्याम कौन था और उसे क्यों फंसाया गया?
श्याम एक सीधा-सादा आदमी था, जिसे मीडिया ने CCTV फुटेज और चुप्पी के आधार पर कातिल घोषित कर दिया।
3. असली कातिल का मकसद क्या था?
कातिल उन लोगों को सज़ा देना चाहता था जो बिना सबूत शोर मचाकर निर्दोषों को अपराधी बना देते थे।
4. कातिल ने अपना संदेश कैसे दिया?
हर खून के बाद वह एक नोट छोड़ता था और अंत में लाइव टेलीकास्ट के जरिए अपनी आपबीती सुनाई।
5. क्या कातिल पकड़ा गया?
नहीं। पुलिस ने दावा किया कि वह पकड़ा गया है, लेकिन बाद में एक पेन ड्राइव में उसकी आवाज़ आई जिसमें उसने कहा कि जब तक मीडिया निर्दोषों को नहीं फंसाएगी, तब तक वह शांत रहेगा।