बेबस पिता की कहानी: जब जिम्मेदारियां सपनों को निगल गईं | 💔 Emotional Hindi Story 2025

बेबस पिता की कहानी: जब जिम्मेदारियां सपनों को निगल गईं | 💔 Emotional Hindi Story 2025

परिचय:

आज हम आपके लिए लाए हैं एक ऐसी कहानी जो आपके दिल को छू जाएगी, आपकी आंखों को नम कर देगी और शायद आपके जीवन का नजरिया बदल देगी। यह कहानी है रमेश नाम के एक आदमी की - एक पिता की, एक बेटे की, एक पति की - जिसने अपनी सारी खुशियां अपने परिवार की जिम्मेदारियों में बलिदान कर दीं।  लेकिन इस कहानी में सिर्फ दर्द नहीं है। यहां है आशा, संघर्ष, और वह पल जब एक पिता को अपनी जिंदगी की असली कीमत समझ आ जाती है। आइए, रमेश के साथ चलिए उसकी इस दर्दनाक लेकिन सार्थक यात्रा पर...

बेबस पिता की कहानी: जब जिम्मेदारियां सपनों को निगल गईं | 💔 Emotional Hindi Story 2025

रमेश अपनी छत पे खड़ा था, जिंदगी से थका हारा। उसे अपनी जिंदगी एक पुरानी घड़ी जैसी लग रही थी।जो टिक टिक तो कर रही थी।पर समय दूसरों के लिए था। जो परिवार की जरूरतों को पूरा करने में समय निकल रहा था।उसके पास अपने लिए 1 दिन भी नहीं था जब वह अपने बारे में सोच सके।वह हर रोज़ शहर को बढ़ते हुए देख रहा था लेकिन अपने लिए कुछ नहीं कर पा रहा था। उसके सपने जिम्मेदारियां में कहीं गुम हो गए। परिवार की जरूरतों को पूरा करते करते मानो उसकी जरूरतें जैसे खत्म ही हो गयी। उसने अपने जिंदगी का हर एक पल अपने परिवार को समर्पित कर दिया। रमेश अपनी जिंदगी का एक हसीन पर याद कर रहा था,और अपनी बीती हुई ज़िंदगी , उसने क्या सोचा था।? और जिंदगी कैसे चली? जब उसे नौकरी मिली थी।वो और उसका परिवार बहुत खुश थे।उन्हें लग रहा था जैसे अब उनकी सारी परेशानियां खत्म हो जाएगी।फिर क्या था फ्लैश्बैक की तरह उसकी जिंदगी का एक एक पल  चल रहा था। बाप का बिज़नेस जो कर्जे में डूबा हुआ था बहन की शादी ,भाई का तलाक।इन सब की जिम्मेदारी अकेले रमेश पर  थी। होने लगा जैसे अब सब कुछ ठीक हो जाएगा। सब काम आराम से हो जाएंगे।मगर उनकी आर्थिक हालत में कोई फर्क नहीं पड़ा।क्योंकि अब रमेश की खुद की  फैमिली के भी खर्चे बढ़ रहे थे। क्योंकि अब बच्चे स्कूल जाने लगे थे।  रमेश  इतनी कोशिश करने के बाद भी वहीं खड़ा था बेबस। उसने अपनी बहन की शादी की थी, अपनी पत्नी के गहने गिरवी रखें दिए।पत्नी के पास जो थोड़ी बहुत संपत्ति थी वो भी चली गयी थी।भाई के तलाक के पैसे देने के लिए उसने लोन लेना पड़ा। भाई हर वक्त नशे में डूबा रहता।इसलिए भाई से मदद मिलेगी इसकी तो कोई उम्मीद ही नहीं थी।छोटे बेटे की चिंता कर माँ बाप का स्वास्थ्य भी थोड़ा खराब रहने लगा था।अब उनकी दवाइयों और ईएमआइ के कारण? खर्चे बढ़ गए थे।आज वो अपने बच्चों का ऐडमिशन अच्छे कॉलेज भी नहीं करवा पा रहा था। क्योंकि उसकी आर्थिक कारक तो इतनी अच्छी नहीं थी कि दोनों बच्चों को अच्छे से पढ़ा सकें।उसी समय बारिश आने लगती है। उसकी ना उम्मीद आंसू के रूप में आँखों से गिरने वाली होती है, लेकिन वे आंसू भी बारिश के बूंद में दिखाई नहीं देते। वो अपने दोनों हाथों को आगे करता है। बारिश की बूंदें उसका हाथों को गीला तो कर रही थी, लेकिन उसके हाथों में कुछ नहीं आ रहा था। उसे लगा जैसे बारिशजी। भी उसकी बेबसी का मजाक उड़ा रही हो।आज जब उसका बेटा कॉलेज के बारे में बताता है की यहाँ पे रिप्लेसमेंट भी अच्छी मिलती हैऔर पूछता है क्या आप?उसको इसमें एडमिशन करवा सकते हो? क्योंकि बेटी तो पहले ही अपने पिता की हालत समझ चुकी थी इसलिए वो सरकारी कॉलेज में जाने लगी।लेकिन बेटे की बात का उसके पास कोई स्पष्ट जवाब नहीं था। कि वो अपने बच्चो को कॉलेज  में पढ़ा पाएगा या नहीं? वो सोचता है काश मैं ना रहूं तो मेरे मरने के बाद इन्सुरेंस के पैसे इनको मिल जाएंगे और इनकी मुश्किलें आसान हो जाएगी। वो अपनी जिंदगी खत्म करने के बारे में सोच ही रहा था।तभी।उससे नीचे से हंसने की आवाज़ सुनाई देती है। उसका बेटा अपनी मम्मी से पूछता है मम्मी पापा कहाँ हैं? मम्मी  कहती है वो छत पर है। मैं चाय बना रही हूँ, उनको आवाज़ लगा  दे।यह सुनकर रमेश अपने वर्तमान में आ गया और ठंड में ठिठुरते हुए नीचे आ गया। पत्नी ने कहा।आपको ठंड लग रही है, चाय पी लो। बेटा पास में बैठा हुआ बोल पड़ा पापा अगर वो कॉलेज नहीं होता तो कोई बात ना मैं कहीं से भी पढ़ लूँगा। बस आप टेंशन मत लिया करो।रमेश अपने बेटे के सिर पर हाथ रखता है और मन ही मन फुसफुसा हैबेटा तू समझदार हो गया है। पर तेरे समझदार होने की कीमत भी कहीं न कहीं मैंने  ही चुकाई है। माँ ने दूर से पुकारा रमेश ज़रा रेडियो की आवाज बढ़ा देना।अच्छा गाना आ रहा है। गाने के शब्द थे।तुम जो इतना मुस्कुरा रहे हो क्या गम है जिसको छुपा रही हो। रमेश की नजर शीशे पर पड़ी जिसमें वह खुद को देख रहा था तब। चेहरे पर हल्की सी मुस्कान थी पर आँखों के नीचे थकान के गहरे घेरे थे।उसने खुद को देखते हुए सोचा इस दुनिया में शायद। मैं अकेला नहीं हूँ ऐसे लाखों चेहरे होंगे जो मुस्कुराहट का मास्क लगाए हुए अपने दर्द को छिपाते होंगे। उसने एक गहरी सांस ली। उसे पता था। की उसकी इच्छाएं उसके अपने सपने कभी पूरे नहीं होंगे।पर उससे यह भी पता था कि उसके टूटू हिट सपनों के टुकड़ों में ही उसके परिवार की खुशियों की इमारत खड़ी है। अभी उसे अपने बच्चों के लिए बहुत कुछ करना था।उसे अपनी सोच पर शर्मिंदगी महसूस होती है की उसने कैसे अपने आप को खत्म करने के बारे में सोच लिया।उसकी।बच्चों की खुशियां तो अभी भी उसी से  ही जुड़ी हुई है। बेटे के लिए बाइक  उसे कॉलेज में पढ़ाना।और बेटी की शादी?रमेश तू अभी जिंदगी से इतनी जल्दी हार नहीं मान सकता।जैसे वह खुद को आगे के लिए तैयार कर रहा हो।कहीं वो अपने इस फैसले पर दोबारा ना सोच ले। अभी तो आधी जिंदगी पहचान पिता की जिम्मेदारी में गई और अब तो खुद की जिम्मेदारी तो अब शुरू हुई है।हार मानने के  बारे में कैसे सोच सकता है?तेरे बाद इनको संभालने वाला है ही कौन? रमेश फिर एक गहरी सांस लेता और अपने आगे के बारे में सोचने लगा। आगे बच्चों के लिए क्या क्या करना है और कैसे?बस जिंदगी ऐसे ही निकल रही थी और यहाँ से ही निकल जाएगी।शायद मेरे लिए मेरी जिंदगी का एक पल भी मुझे नहीं मिल पायेगा।शायद देख जिम्मेदारी मेरे लिए बनी है और मैं जिम्मेदारियों के लिए।इसके अलावा कुछ नहीं।

F&Q:-

Q1. रमेश छत पर क्यों खड़ा था?  

रमेश छत पर खड़ा था क्योंकि वह अपनी जिंदगी के बोझ से इतना थक गया था। परिवार की जिम्मेदारियां, कर्ज, भाई की समस्याएं - सब कुछ उसके कंधों पर था।  

Q2. क्या रमेश अपनी बेटी-बेटे को पढ़ा पाया?  

कहानी में रमेश को अभी भी आर्थिक मुश्किलें आ रही हैं, लेकिन उसका बेटा समझदार है। बेटी पहले ही सरकारी कॉलेज जा चुकी है।  

Q3. इस कहानी का सीख क्या है?  

जीवन सिर्फ खुद के लिए नहीं, बल्कि उन लोगों के लिए भी है जो हमसे प्यार करते हैं।  

Q4. क्या बारिश का होना महत्वपूर्ण है?  

हां, बारिश प्रतीकात्मक है। यह रमेश के आंसुओं, दर्द और बेबसी को दर्शाती है।  

Q5. यह कहानी किन लोगों के लिए है?  

उन सभी के लिए जो परिवार की जिम्मेदारियों का बोझ उठा रहे हैं और अपने सपने खो चुके हैं।

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