निठारी - शहर के अंधेरे में खोई मासूमियत: भारत की सबसे भयानक सच्ची कहानी | 19 बेटियां, 20 साल का संघर्ष, कोई न्याय नहीं
परिचय:-
झब्बू लाल एक रिक्शा चालक का बेटा नहीं। वह एक बेटी की पापा हैं। ज्योति। 10 साल की बेटी। जो एक सुबह D-5 के सामने से गुजरी। और फिर... कभी वापस नहीं आई। 17 महीने तक झब्बू लाल ने अपनी बेटी को खोजा। मुंबई के वेश्यालयों में। दिल्ली के जी.बी. रोड पर। आखिरकार, नाले से ज्योति की हड्डियां मिलीं। अपने ही घर से सिर्फ 30 फीट दूर। झब्बू लाल ने अपना घर बेच दिया न्याय के लिए। 20 साल तक अदालतों के चक्कर लगाए। लेकिन 2025 में? कोई न्याय नहीं। सिर्फ दर्द। यह है निठारी की कहानी।
शहर का काला सपना
नोएडा। सेक्टर 31। 2005। निठारी गांव कभी शांत था। एक ऐसी जगह जहां पश्चिम बंगाल और बिहार से आए गरीब लोग अपना जीवन बनाने की कोशिश करते थे। बस्ती की गलियों में बच्चों की हंसी गूंजती थी। औरतें घरों की सफाई करतीं, पुरुष मजदूरी करते थे। यह एक ऐसी दुनिया थी जहां हर दिन एक संघर्ष था, लेकिन रात को घर लौटना ही सब कुछ था। लेकिन 2005 के अंत से, निठारी की हवा बदलने लगी। पहले रिम्पा हलदार गायब हुई। 8 फरवरी 2005। महज 14 साल की बेटी। उसकी माँ डॉली ने पुलिस को सूचित किया। लेकिन पुलिस ने क्या कहा? "वह किसी प्रेमी के साथ भाग गई होगी।" गरीब परिवार की बेटी के लिए ये ही सब कुछ था। कोई कागज नहीं। कोई दर्ज शिकायत नहीं। सिर्फ निर्दयता। फिर और बेटियां गायब होने लगीं। मार्च में एक। जून में दो। अगस्त में तीन। हर बार यही कहानी। हर बार यही जवाब। पुलिस अधिकारी गांव की महिलाओं से कहते - "ये बड़ी हो गईं हैं। घर छोड़ गईं होंगी।" निठारी की माताओं की चीखें किसी को नहीं सुनाई दे रही थीं।
D-5 - सपनों के पीछे का अंधेरा
नोएडा के सेक्टर 31 में एक बंगला था। नाम - D-5। बाहर से देखने में बिल्कुल सामान्य। आधुनिक। साफ-सुथरा। दो शहर के महंगे मॉलों के बीच स्थित। यह बंगला मोनिंदर सिंह पंधेर का था - एक समृद्ध व्यवसायी जो JCB मशीनें बेचता था। पंधेर 52 साल का था। शिक्षित। भारत के सबसे अच्छे स्कूलों से पढ़ा हुआ। Bishop Cotton School, Shimla से और St Stephen's College, Delhi से। लेकिन कहीं भीतर... कहीं गहराई में... कुछ टूट गया था। शादी बिखर गई थी। पत्नी उसे छोड़ गई थी। बेटा विदेश में था। अकेलेपन की अंधेरी गलियों में भटकते हुए, पंधेर एक अलग दुनिया में उतर गया। और वह दुनिया का प्रवेश द्वार था - सुरेंद्र कोली। कोली एक नौकर था। छोटा कद। डबली शरीर। 2004-05 में वह पंधेर के घर काम करने लगा। सतह पर, वह एक आज्ञाकारी नौकर था। रसोई का काम। घर के काम। लेकिन सच कुछ और था। कोली और पंधेर के बीच एक गहरा रिश्ता बनने लगा। एक ऐसा रिश्ता जो अंधेरी इच्छाओं पर आधारित था। सुरेंद्र वह "शिकारी" था जो बाहर निकलता था।
शिकार - मिठाई और वादे
जयोति की कहानी एक सामान्य दिन की सुबह थी। जयोति - महज 10 साल की लड़की - अपने घर से निकली। उसके पिता झब्बू लाल कपड़े प्रेस करके अपना जीवन चलाते थे। माँ सुनीता घर-घर में झाड़ू-पोछा करती थी। जयोति छठी क्लास में पढ़ती थी। सरकारी स्कूल की छात्रा। उसके सपने बस इतने थे - पढ़ना, बड़ी होना, माता-पिता की मदद करना। वह सुबह, जयोति पड़ोस के घरों में कपड़े देने गई। D-5 के सामने पहुंचते ही, जयोति ने एक आदमी को देखा। सुरेंद्र। उसका चेहरा हंस रहा था। उसके हाथ में मिठाई थी। "बेटा, ये मिठाई ले। तुम्हारे लिए बनी है," उसने कहा। जयोति थोड़ा संकोच की, लेकिन मिठाई... बचपन में मिठाई का लालच कितना बड़ा होता है। और फिर सुरेंद्र के चेहरे पर हंसी थी। कोई खतरा नहीं लगा। "आ, बस एक पल के लिए घर में चल। मेरी मालकिन भी तुम्हें देखना चाहती हैं।" जयोति ने हां कह दी। D-5 के लोहे के दरवाजे बंद हुए।
जो देखा नहीं जा सकता
हम वह नहीं लिख सकते जो D-5 के भीतर हुआ। कानून, नैतिकता, और मानवीय सम्मान - सब कुछ यहां कुचल दिया गया था। जो जानते हैं, वे बताते हैं कि: पंधेर और कोली एक साथ काम करते थे। पहले लड़कियों का बलात्कार। फिर... गला घोंटना। फिर शरीर को... बाथरूम में ले जाना। एक रसोई का चाकू। पानी की टंकी। और फिर वह सब... नाले में। AIIMS के डॉक्टरों ने कहा - शवों को काटने में "कसाई जैसी सटीकता" थी। हड्डियां तीन भागों में कांटी गई थीं - सिर, धड़, पैर। कुछ को सल्फ्यूरिक एसिड में डाला गया था। कुछ को आधी-अधूरी भस्म की गई थी। यह केवल क्रूरता नहीं थी - यह एक सुनियोजित, दहशत भरी प्रणाली थी। और यह सब सेक्टर 31 के बीच, मॉलों के बीच, शहर के दिल में हो रहा था।
जब मां का इंतजार खत्म हो जाता है
पायल की गायब होना - जो सब कुछ बदल देगा 7 मई 2006। पायल - 22 साल - नाम भी था दीपिका। उसके पिता नंद लाल एक रिक्शा चालक थे। पायल का एक सपना था - अपने भाई को एक नौकरी दिलवाना। एक बेहतर जीवन। D-5 के सामने से निकलते हुए, पायल ने सुना - "बेटा, अंदर चल। तुम्हारे भाई के लिए अच्छी नौकरी है।" वह चली गई। वह कभी वापस नहीं आई। महीनों बीत गए। नंद लाल चिल्लाता रहा - "मेरी बेटी कहां है?" पुलिस का जवाब? "वह किसी के साथ भाग गई होगी।" एक रिक्शा चालक का बेटा? किसे फर्क पड़ता था? लेकिन नंद लाल ने हार नहीं मानी। उसने अदालत में अर्जी दी। अक्टूबर 2006। तब जाकर पुलिस ने पायल की Nokia 1100 को ट्रैक करना शुरू किया। उस फोन का IMEI नंबर - एक अदृश्य सूत्र - सुरेंद्र कोली तक पहुंचा।
जब अंधेरा प्रकाश से टकराया
29 दिसंबर 2006। निठारी के दो रहवासी - जिनकी अपनी बेटियां लापता थीं - D-5 के पीछे के नाले में खोदना शुरू किया। स्थानीय लोगों की भीड़ इकट्ठा हो गई। कुदाली की आवाजें। मिट्टी उड़ने लगी। फिर... खोपड़ी। एक। दो। तीन। छोटी खोपड़ियां। बच्चियों की खोपड़ियां। भीड़ की चीखें गूंज उठीं। पुलिस पहुंची। जांच शुरू हुई। नाले को खोदा गया। एक पॉलिथीन बैग से दूसरा निकला। हर बैग में हड्डियां। कपड़े। जूते। कुल 16-19 कंकाल। कुछ तो जल गए हुए थे। कुछ सड़ गए हुए थे। लेकिन सब पहचाने जा सकते थे। निठारी की माताएं चिल्लाईं। कुछ को अपनी बेटियों की पहचान मिली। कुछ को अभी भी अपनी बेटियां नहीं मिलीं। क्योंकि 19 कंकाल से ज्यादा थे... संभावित 21 से 31 तक। कहां हैं बाकी बेटियां?
पुलिस, सत्ता, और गायबी न्याय यहां कहानी बदल जाती है।
न्याय की कहानी शुरू होती है। लेकिन बदतर हो जाती है। गिरफ्तारियां - 26-27 दिसंबर 2006 सुरेंद्र कोली और मोनिंदर सिंह पंधेर दोनों को गिरफ्तार किया गया। लेकिन यहां से समस्याएं शुरू होती हैं। कबूलनामा - 60 दिन की पीड़ा कोली को 60 दिन तक पुलिस हिरासत में रखा गया। बिना मेडिकल जांच के। बिना वकील की सलाह के। अलग-अलग पूछताछ। दबाव। डर। 1 मार्च 2007। अंततः, कोली ने एक मैजिस्ट्रेट के सामने एक लिखित कबूलनामा दिया। उसने कहा - "मैंने सब कुछ किया। सब हत्याएं मैंने कीं। बलात्कार। हत्या। शव विच्छेदन। सब मैंने किया।" लेकिन अदालत ने बाद में पाया - यह कबूलनामा जबरदस्ती लिया गया था। कोली की शिक्षा सिर्फ सातवीं तक थी। लेकिन कबूलनामे में इस्तेमाल की गई भाषा... कानूनी शब्द... व्याकरण... यह सब कोली के शिक्षा स्तर से बहुत ऊपर था। यह लिखा गया था, बताया नहीं। मैजिस्ट्रेट के साथ पूछताछ करने वाला अधिकारी भी हर समय कमरे में मौजूद था - जो कानून में वर्जित है। सबूत - जहां न्याय टूट जाता है D-5 के पीछे के नाले में जहां हड्डियां मिलीं, वह जनता के लिए खुली जगह थी। पहले से ही मीडिया, पड़ोस के लोग, पुलिस सब वहां थे। खुदाई शुरू हो चुकी थी कोली के कथित "कबूलनामे" से पहले ही। कानून कहता है - अगर कोई अपराधी बताता है कि कहां सबूत है, तो उसे उसी समय ले जाकर यह साबित करना होता है। लेकिन यहां? कोई ने कोली को देखा ही नहीं कि वह इन हड्डियों को "खोज" रहा हो। सब कुछ पहले से खोदा जा चुका था। डीएनए से मिली पहचान - लेकिन कातिल नहीं AIIMS की प्रयोगशाला ने DNA परीक्षण किया। हां, हड्डियां लापता बच्चों के परिवारों की थीं। लेकिन... यह साबित नहीं हुआ कि कोली ने उन्हें मारा। D-5 में खोज में कोई खून के धब्बे नहीं मिले। ऐसे में, कहां 19 हत्याएं हुई होंगी? कोई ऊतक साक्ष्य नहीं। कोई रक्त पैटर्न नहीं। एक आदमी ने अगर 19 लोगों को काटा होता, तो... घर खून से भरा होता। लेकिन कुछ नहीं मिला। वह एंगल जो कभी खोला ही नहीं गया महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की एक रिपोर्ट में कहा गया था - शवों में "सर्जिकल सटीकता" थी। कटाव बहुत प्रोफेशनल था। यह "कसाई की सटीकता" नहीं, एक डॉक्टर की सटीकता लग रही थी। क्या यह अंग व्यापार का मामला था? D-5 के पड़ोस में - D-6 में - एक डॉक्टर रहता था। जो पहले किडनी घोटाले में गिरफ्तार हो चुका था। लेकिन CBI ने कभी उसका बयान भी नहीं लिया। यह एंगल कभी खोला नहीं गया।
2009 - पहली बार न्याय (या न्याय का भ्रम?)
13 फरवरी 2009। गाजियाबाद की एक विशेष CBI अदालत ने अपना फैसला सुनाया। रिम्पा हलदार की हत्या के मामले में - वह 14 साल की बेटी जो 2005 में गायब हुई थी। कोली को फांसी की सजा दी गई। पंधेर को कम सजा। निठारी के गांव में एक चिंगारी सी प्रज्ज्वलित हुई। लोग सोचने लगे - शायद न्याय होगा। लेकिन यह चिंगारी शीघ्र ही बुझ गई।
2023 - जब न्याय पीछे मुड़ गया
16 अक्टूबर 2023। इलाहाबाद हाईकोर्ट। दो न्यायाधीशों की पीठ - Justice अश्विनी कुमार मिश्रा और Justice सैयद आफताब रिज्वी - ने एक विस्तृत फैसला सुनाया। उन्होंने 12 मामलों में कोली को बरी कर दिया। 2 मामलों में पंधेर को बरी कर दिया। अदालत ने कहा - "अभियोजन पक्ष ने अपना मामला साबित करने में विफल रहा।" फिर, हाईकोर्ट ने एक-एक करके सब समस्याओं को रेखांकित किया: कबूलनामा पर सवाल - जबरदस्ती का था। सबूत पर सवाल - कोई ठोस साक्ष्य नहीं। जांच पर सवाल - महत्वपूर्ण एंगल नहीं खोजे गए। हाईकोर्ट ने कहा - "इस अदालत को खेद है कि सच का पता नहीं चल सका।
2025 - आखिरी पर्दा जुलाई 2025
सुप्रीम कोर्ट ने CBI की 14 अपीलों को खारिज कर दिया। कोली को 12 मामलों में बरी करने के हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराया। 11 नवंबर 2025। रिम्पा हलदार के मामले में - आखिरी मामला - एक क्यूरेटिव पिटीशन (भारतीय कानून में सबसे आखिरी कानूनी उपाय) में सुप्रीम कोर्ट ने कोली को पूरी तरह बरी कर दिया। मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई ने कहा - "शक, चाहे कितना गहरा हो, सबूत की जगह नहीं ले सकता।" 12 नवंबर 2025। 19 साल की जेल के बाद, सुरेंद्र कोली जेल से रिहा कर दिया गया।
जो बचे हुए हैं - दर्द की कहानी
झब्बू लाल - ज्योति के पिता झब्बू लाल कपड़े प्रेस करते थे। छोटी कमाई। साधारण जीवन। उनकी बेटी ज्योति - 10 साल - स्कूल जाती थी। 17 महीने तक वह ज्योति को खोजते रहे। मुंबई के वेश्यालयों में। दिल्ली के जी.बी. रोड पर। हर जगह। अपना घर बेच दिया न्याय के लिए। उधार लिए। अदालतों के चक्कर लगाए। 20 साल बीत गए। जब सुप्रीम कोर्ट ने कोली को बरी कर दिया, तो झब्बू लाल से पूछा गया - "अब आप क्या सोचते हैं?" वह रो पड़े। "अगर कोली ने नहीं मारा तो किसने मारा? 19 साल तक कोली जेल में क्यों रहा? हमने हार मान ली। अब बाकी सब भगवान पर निर्भर है।" डॉली हलदार - रिम्पा की माँ डॉली का बेटा रिम्पा - 14 साल - 2005 में गायब हुई। 2009 में, कोली को फांसी की सजा। डॉली को कुछ सांत्वना मिली। कम से कम, किसी को सजा तो मिली। लेकिन 2025 में? आखिरी मामले में भी कोली को बरी कर दिया गया। डॉली रो रही है। "उसने खुद पुलिस थाने में कहा था - मैंने बेटी को मारा। अगर यह सबूत नहीं है, तो और क्या है?" अन्य परिवार अशोक और राजवती - 5 साल का बेटा खो दिया। 19 साल इंतजार। अब आशा नहीं रही। लक्ष्मी - 8 साल की बेटी 2006 में गायब। 19 साल की लड़ाई। कोई न्याय नहीं। ये सब परिवार अभी भी निठारी में रहते हैं। अपने घरों के सामने, उसी ज़मीन पर, जहां उनकी बेटियां मारी गई थीं।
सुरेंद्र कोली - रिहाई के बाद
19 साल की जेल के दौरान, कोली ने सब कुछ खो दिया। उसकी पत्नी शांति - जो 2006 में गर्भवती थी - 10 साल तक जेल में मिलने जाती रही। लेकिन 2015 में, जब हाईकोर्ट ने फांसी की सजा बरकरार रखी, तो शांति का हौसला टूट गया। वह बेटे को लेकर कहीं और चली गई। कोली की माँ कुंती देवी - अपने बेटे की रिहाई की उम्मीद में ही मर गईं। कोली के भाई चंदन - जो दिल्ली में रहते हैं - ने कहा: "अभी तक कोई संपर्क नहीं हुआ।" मंगरूखाल के गांववासियों ने कहा - "अगर कोली गांव आता है, तो हम उसे घर बनाने में मदद करेंगे। हम जानते हैं वह बेकसूर है।" लेकिन क्या कोली कभी सामान्य जीवन जी सकेगा?
मोनिंदर सिंह पंधेर - गायब हो गया
पंधेर जुलाई 2025 में रिहा हो गया। तब से उसका कोई पता नहीं है। कहां गया? क्या कर रहा है? कोई नहीं जानता। दो दशक का अपराधबोध... या नहीं?... उसे कहीं और ले गया। निथारी मामले की समयरेखा: 20 साल की जांच, मुकदमा और विवादास्पद फैसला
सिस्टम की विफलता - न्याय नहीं
निर्ममता निठारी कांड भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली की गंभीर विफलता का प्रतीक है। यह केवल एक केस नहीं है - यह एक चेतावनी है।
समस्या
1: पुलिस की लापरवाही पहली समस्या शुरुआत में ही शुरू हो गई। 2005 में रिम्पा गायब हुई। पुलिस ने FIR दर्ज नहीं की। पायल गायब हुई। FIR नहीं। सुनीता ने रिपोर्ट दी। पुलिस ने कहा - "बेटा भाग गई।" 6 महीने तक कोई एफआईआर नहीं। अदालत के आदेश के बाद अक्टूबर 2006 में आखिरकार FIR दर्ज हुई। यदि FIR पहले ही दर्ज हो जाती, तो कितनी बेटियों की जिंदगी बच जाती? पुलिस अधिकारियों को भ्रष्टाचार के लिए निलंबित किया गया, लेकिन... बहुत देर हो चुकी थी।
2: साक्ष्य की विश्वसनीयता कोली का कबूलनामा 60 दिन की पुलिस हिरासत के बाद आया। बिना वकील के। चिकित्सा जांच के बिना। कानून कहता है - ऐसा कबूलनामा स्वीकार्य नहीं है। फिर भी, 2009 में पहली अदालत ने इसी पर निर्भर रहकर फांसी की सजा दी। 14 साल बाद (2023 में), हाईकोर्ट ने उसे अमान्य घोषित किया। एक ही साक्ष्य - दो अलग फैसले। यह न्याय है?
3: अधूरी जांच अंग व्यापार का एंगल कभी खोजा ही नहीं गया। D-6 के डॉक्टर का बयान दर्ज नहीं किया गया। महत्वपूर्ण गवाहों की पूछताछ नहीं की गई। सर्जिकल सटीकता के साथ काटे गए शव... लेकिन कोई सर्जिकल जांच नहीं?
4: अन्याय की देरी 19 साल। 19 साल में क्या सब कुछ बदल नहीं जाता? गवाहों की यादें धुंधली हो जाती हैं। साक्ष्य नष्ट हो जाते हैं। लड़कियों की माताएं उम्र भर हो जाती हैं। कोली 19 साल जेल में बिता देता है। और आखिरकार... न्याय का पहिया पूरी तरह उलट जाता है। यह देरी ही अन्याय है।
निठारी पीड़ित: आयु वितरण और पारिवारिक पृष्ठभूमि का विश्लेषण उपसंहार
निठारी की हवा अभी भी है D-5 अभी भी वहां खड़ा है। सील किया हुआ। खाली। भूतों का घर। पड़ोस के लोग कहते हैं - रात को खिड़कियों में एक छाया दिखाई देती है। तहखाने से अजीब आवाजें आती हैं। भावनात्मक सत्य क्या है? न्यायिक सत्य से कहीं ज्यादा जटिल। पीड़ित परिवारों के लिए, 19 खोई हुई जिंदगियां पर्याप्त सबूत हैं। 19 कंकाल पर्याप्त सबूत हैं। एक माँ का आँसू पर्याप्त सबूत है। लेकिन कानून कहता है - "शक, चाहे कितना गहरा हो, सबूत की जगह नहीं ले सकता।" निठारी की कहानी अभी तक अनसुलझी है। और शायद... हमेशा के लिए अनसुलझी रहेगी। यह सच है। यह 2005-2006 का नोएडा है। यह भारत का अपराध इतिहास है।
FAQ:-
Q1: निठारी कांड में कुल कितने लोग मारे गए?
A: कम से कम 19 बेटियां और महिलाएं पुष्टि के साथ मारी गईं। उनकी उम्र 5 से 25 साल के बीच थी। लेकिन CBI के अनुसार, 21 से 31 तक पीड़ित हो सकते हैं। कुछ का कंकाल कभी नहीं मिला। कुछ की पहचान आज भी संदिग्ध है।
Q2: D-5 बंगला कहां है और वहां क्या होता था?
A: D-5 नोएडा के सेक्टर 31 में स्थित है - महंगे शॉपिंग मॉलों के बीच। यह बंगला मोनिंदर सिंह पंधेर का था। वहां बलात्कार, हत्या, शव विच्छेदन होता था। शवों को बाथरूम में काटा जाता था। फिर नाले में फेंका जाता था। यह एक सुनियोजित अपराध मशीन थी।
Q3: सुरेंद्र कोली कौन था?
A: कोली एक रसोइया था जो 2004-05 में पंधेर के घर काम करने लगा। उत्तराखंड के अल्मोड़ा से आया था। शिक्षा सिर्फ सातवीं तक थी। छोटा कद, दुबला-पतला। लेकिन भीतर - एक भीषण राक्षस। वह वह "शिकारी" था जो बाहर निकलता था - मिठाई और नौकरी का वादा करके बेटियों को फंसाता था।
Q4: पायल की गायबी से क्या खुलासा हुआ?
A: 7 मई 2006 को 22 साल की पायल D-5 पर गई। उसका भाई नौकरी लेने के लिए। पायल कभी वापस नहीं आई। पुलिस ने 6 महीने तक कोई एफआईआर दर्ज नहीं की। लेकिन उसके Nokia 1100 के IMEI नंबर ने एक अदृश्य सूत्र बन गई। यही सूत्र सुरेंद्र कोली तक पहुंचा। और पूरा खेल उजागर हो गया।
Q5: सुप्रीम कोर्ट ने अपराधियों को बरी क्यों किया?
A: सुप्रीम कोर्ट ने कहा - "शक, चाहे कितना गहरा हो, सबूत की जगह नहीं ले सकता।" कोली का कबूलनामा जबरदस्ती लिया गया था (60 दिन की पुलिस हिरासत में, बिना वकील के)। धारा 27 के तहत रिकवरी अमान्य थी। DNA से सिर्फ पहचान मिली, हत्या का सबूत नहीं। D-5 में कोई खून के धब्बे नहीं मिले। अदालत को संदेह में सजा नहीं दे सकते।
Q6: अंग व्यापार का एंगल क्या है?
A: महिला मंत्रालय की रिपोर्ट में कहा गया - शवों में "सर्जिकल सटीकता" थी। हड्डियों की कटाई बहुत प्रोफेशनल थी - कसाई नहीं, डॉक्टर की सटीकता। D-6 में एक डॉक्टर रहता था जो पहले किडनी घोटाले में गिरफ्तार था। लेकिन CBI ने कभी उसका बयान दर्ज नहीं किया। यह एंगल कभी खोला नहीं गया।
Q7: पीड़ित परिवारों को कितना मुआवजा मिला?
A: 2007 में कुछ परिवारों को ₹2,00,000 का मुआवजा दिया गया। लेकिन परिवारों ने यह खारिज कर दिया। झब्बू लाल ने अपना पूरा घर बेच दिया न्याय के लिए। अन्य परिवार अभी भी निठारी में रहते हैं - उसी ज़मीन पर जहां उनकी बेटियां मारी गई थीं।
Q8: निठारी की कहानी आज क्या है?
A: D-5 अभी भी खड़ा है - सील किया हुआ, खाली, भूतों का घर। पड़ोस के लोग कहते हैं - रात को खिड़कियों में छाया दिखाई देती है। तहखाने से अजीब आवाजें आती हैं। पीड़ित परिवार अभी भी इंतजार में हैं - शायद न्याय का, शायद सच का। लेकिन शायद हमेशा के लिए अधूरी रहने वाली कहानी।
