अरावली पर्वतमाला को बचाएं: भारत का सबसे बड़ा संकट और समाधान | अवैध खनन, जलवायु आपदा

 

 अरावली पर्वतमाला को बचाएं: भारत का सबसे बड़ा संकट और समाधान | अवैध खनन, जलवायु आपदा

परिचय

अरावली पर्वतमाला सिर्फ पत्थरों और पेड़ों का एक समूह नहीं है। यह भारत के उत्तर-पश्चिमी हिस्से की आत्मा है - वह रक्षा दीवार जो थार रेगिस्तान को पूर्व की ओर बढ़ने से रोकती है, वह प्राकृतिक फिल्टर जो दिल्ली की हवा को शुद्ध करता है, और वह जल बैंक जो लाखों मनुष्यों को पीने का पानी देता है। लेकिन आज यह विरासत गंभीर संकट में है। अवैध खनन, प्रदूषण, और शहरीकरण के कारण यह पर्वत प्रतिदिन मर रहा है। अगर हम अभी नहीं जागे, तो आने वाली पीढ़ियों को एक बंजर, प्यासा और जहरीला भारत मिलेगा।​

Aravalli Mountains: Preserved forest vs. destroyed mining lands comparison

अरावली का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व: भारत की शक्ति का प्रतीक

अरावली पर्वतमाला भारत के सबसे प्राचीन पर्वत श्रंखलाओं में से एक है, जो लगभग 3.2 अरब वर्षों पहले धरती पर उभरी थी। यह 700 किलोमीटर से अधिक लंबी यह पर्वत माला गुजरात से शुरू होकर दिल्ली तक फैली है, और इसका लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा राजस्थान में स्थित है। इसे "राजस्थान की रीढ़" कहा जाता है क्योंकि यह राजस्थान को उत्तर से दक्षिण दो भागों में विभाजित करती है और इसकी ऊंचाई 300 से 900 मीटर तक होती है, जबकि इसकी सबसे ऊंची चोटी गुरु शिखर माउंट आबू में 1,722 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।​

राजपूत साम्राज्य और सैनिक महत्व

मध्यकालीन भारत में अरावली पर्वतमाला राजपूत सभ्यता का केंद्र बिंदु था। इसकी खड़ी चट्टानें और दुर्गम भू-भाग इसे सैनिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बनाते थे। चित्तौड़गढ़, कुंभलगढ़ और रणथंभौर जैसे प्रसिद्ध किलों का निर्माण इसी पर्वत श्रृंखला पर हुआ था, जो आज यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल हैं। कुंभलगढ़ का किला विशेषकर प्रसिद्ध है, जिसकी दीवार 36 किलोमीटर लंबी है और इतनी चौड़ी है कि इस पर आठ घोड़े एक साथ चल सकते हैं। यह किला सिर्फ एक सैनिक दुर्ग नहीं था, बल्कि कला, संगीत, वास्तुकला और संस्कृति का केंद्र भी था।​

महाराणा प्रताप जैसे महान योद्धाओं ने अरावली की दुर्गम भू-भाग का उपयोग करके मुगल आक्रमणकारियों के विरुद्ध लंबे समय तक संघर्ष किया। 1576 के हलदीघाटी के युद्ध के बाद, प्रताप को मुगल सेनाओं से परास्त होना पड़ा, लेकिन वह अरावली की पहाड़ियों में शरण लिया और गुरिल्ला युद्ध की रणनीति से मुगल सेनाओं को वर्षों तक चुनौती दी। उन्होंने कभी हार नहीं मानी और अपनी मातृभूमि की आजादी के लिए आजीवन संघर्ष करते रहे। इन पहाड़ियों ने मेवाड़ की रक्षा की और इसका नाम इतिहास में अमर कर दिया।​

धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर

अरावली क्षेत्र में स्थित राणकपुर जैन मंदिर 15वीं शताब्दी की एक अद्भुत वास्तुकलात्मक कृति है। इस मंदिर में 1,444 अनन्य नक्काशीदार स्तंभ हैं, प्रत्येक स्तंभ पर अलग-अलग नक्काशियां हैं। यह मंदिर 50 वर्षों (1446-1496) में कारीगरों के समर्पित परिश्रम से निर्मित हुआ और प्रत्येक जटिल पत्थर में दिव्य भावना को प्रतिफलित करता है। जयपुर के तीन प्रसिद्ध किले - आमेर, जयगढ़ और नाहरगढ़ - भी अरावली पर्वतमाला पर ही स्थित हैं। ये सभी स्मारक राजपूत और मुगल वास्तुकला के संमिश्रण का प्रतीक हैं और आज भी भारतीय संस्कृति की सहिष्णुता और बहुलवाद की गाथा बयां करते हैं।​

अरावली का जलवायु और मानसून पर महत्वपूर्ण प्रभाव

अरावली पर्वतमाला उत्तरपश्चिमी भारत की जलवायु का सबसे महत्वपूर्ण नियंत्रक है। बिना अरावली के, राजस्थान के समतल मैदान और दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र पूरी तरह से रेगिस्तान में तब्दील हो जाते। वर्तमान में, थार मरुस्थल अरावली के कारण ही दिल्ली से लगभग 200 किलोमीटर दूर रह गया है। अरावली के लगातार वन आवरण की कटाई से दिल्ली की जलवायु दशकों के अंदर अर्ध-रेगिस्तानी परिस्थितियों में बदल सकती है।​

अरावली मानसून बादलों को पूर्वोत्तर दिशा में निर्देशित करता है, जिससे शिमला और नैनीताल क्षेत्रों तक वर्षा पहुंचती है और उत्तरी भारतीय मैदानों को जलसंचय मिलता है। इसके बिना, उत्तरपश्चिमी भारत में वर्षा का पैटर्न पूरी तरह बदल जाता और सूखे की स्थिति और अधिक गंभीर हो जाती। अरावली की क्षति से स्थानीय तापमान में 3-4 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि पहले ही दर्ज की जा चुकी है, और वर्षा के पैटर्न में अनियमितताएं बढ़ी हैं। इसकी वनस्पति की हानि से गर्मी के प्रभाव को कम करने की क्षमता में कमी आई है, जिससे उत्तरपश्चिमी भारत में लू की तीव्रता में भारी वृद्धि हुई है।​

अरावली की जल संचय प्रणाली: भूजल का जादू और गायब होती जीवन रक्त

अरावली की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसकी भूजल पुनर्भरण क्षमता है। भंगुर और अपक्षयित चट्टानें, प्राकृतिक दरारें और झरझरी संरचना वर्षा के पानी को गहराई तक रिसने देती है, जिससे भूजल जलभृत का पुनर्भरण होता है। गणनाओं से पता चलता है कि अरावली परिदृश्य के प्रत्येक हेक्टेयर से 20 लाख लीटर भूजल का वार्षिक पुनर्भरण संभव है। ये जलभृत आपस में जुड़े हुए हैं, जिससे पूरे क्षेत्र की जल प्रणाली एक एकीकृत नेटवर्क बनाती है। इन जलभृतों की गहराई 1500-2000 फीट तक हो सकती है, और ये दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा और राजस्थान की दसियों लाख आबादी को पीने का पानी प्रदान करती हैं।​

अरावली क्षेत्र में ऐतिहासिक काल से झरने, झीलें, तालाब, बावड़ियां और सीढ़ीदार कुएं मौजूद थे, जो वर्षा के जल को संचित करते थे। आधुनिक ट्यूबवेल और बोरवेलों के आने से, इन पारंपरिक तरीकों को भुला दिया गया। खनन की शुरुआत होने से जलभृत तेजी से खाली होने लगे। अलवर जिले जैसे क्षेत्रों में भूजल की गहराई 10 मीटर से बढ़कर 150 मीटर हो गई है, जबकि महेंद्रगढ़ में कुछ क्षेत्रों में पानी 1,500-2,000 फीट की गहराई तक पहुंच गया है।​

अरावली की जैव विविधता: जीवन की खजाना जो खो रहा है

अरावली पर्वतमाला एक महत्वपूर्ण जैव विविधता हॉटस्पॉट है। इसके वनों में 400 से अधिक देशी पेड़, झाड़ियों, घासों और जड़ी-बूटियों की प्रजातियां पाई जाती हैं। वन्यजीव संरक्षण की दृष्टि से, अरावली 200 से अधिक देशी और प्रवासी पक्षी प्रजातियों, 100 से अधिक तितली प्रजातियों, 20 से अधिक सरीसृप प्रजातियों और 20 से अधिक स्तनपायी प्रजातियों का घर है। तेंदुए, धारीदार लकड़बग्घे, गोल्डन सियार, नीलगाय, भारतीय लोमड़ी, जंगली बिल्ली, लाल मुनिया और शहद का बिज्जू जैसी दुर्लभ प्रजातियां यहां पाई जाती हैं।​

लेकिन खनन और वन विनाश के कारण पिछले 50 वर्षों में वर्षा में 10-15% की कमी दर्ज की गई है, जिससे जल निकाय सूख गए और कृषि उत्पादन में लगभग 50% की गिरावट आई है। 1971 में कृषि में 65% आबादी नियोजित थी, जो 2011 तक घटकर 40% रह गई है। इससे ग्रामीण लोग शहरों की ओर पलायन के लिए मजबूर हो गए। सरिस्का टाइगर रिजर्व, जो एक समय बाघों के लिए प्रसिद्ध था, खनन के कारण लगभग बाघ विहीन हो गया था। लेकिन जब खनन बंद हुआ, तो बाघों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी, यह साबित करते हुए कि अरावली कितना महत्वपूर्ण है।​​

अरावली का विनाश: अवैध खनन और शहरीकरण का भयावह संकट
खनन की तबाही

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त समिति की 2018 की रिपोर्ट के अनुसार, राजस्थान के 218 पहाड़ों में से 31 को अवैध खनन के कारण पूरी तरह से समतल कर दिया गया है। यह केवल एक संख्या नहीं है - यह हजारों साल की भूवैज्ञानिक संरचना का पूर्ण विनाश है। पत्थर और बालू का खनन अरावली की सबसे बड़ी समस्या है। ये खनन गतिविधियां 50 मीटर से अधिक गहराई तक जाती हैं, जिससे जलभृत में सीधे भेदन होता है और जल प्रवाह में गंभीर व्यवधान उत्पन्न होता है।​

इन खदानों में तेजाब जैसे प्रदूषकों का मिश्रण हो जाता है, जो भूजल को जहरीला बना देता है। खनन के कारण बनी ये खाली खदानें दुर्घटनाओं का कारण बनती हैं और सदियों तक भूस्खलन का खतरा बने रहते हैं। खनन का कानून कहता है कि जल स्तर से ऊपर 2 मीटर तक ही खनन की अनुमति है, लेकिन अधिकांश मामलों में खनन जल स्तर से 200 फीट नीचे तक किया जाता है। हरियाणा के कई गांवों में 150 बोरवेलों में पानी की गहराई 200 फीट तक पहुंच गई है, जो खनन के प्रत्यक्ष परिणाम हैं।​

प्रदूषण और शहरीकरण

अरावली के चारों ओर अनियंत्रित शहरीकरण भी इसकी तबाही का एक प्रमुख कारण है। अरावली क्षेत्र में 100 से अधिक स्थानों पर ठोस, रासायनिक और औद्योगिक कचरे की अवैध डंपिंग की जा रही है। गुड़गांव और फरीदाबाद के नगर निगम का कचरा एकत्र करने वाली कंपनी (इकोग्रीन) बांधवड़ी लैंडफिल से जहरीला लीचेट (लीचेट वह द्रव है जो तब बनता है जब वर्षा का पानी कचरे के ढेर से होकर नीचे की ओर रिसता है) अरावली के आसपास के वन क्षेत्र में अवैध रूप से बहा रही है। इससे 2017 में 3 गांवों में भूजल प्रदूषण देखा गया था, जो 2019 तक बढ़कर 5 गांवों में पहुंच गया है।​

सुप्रीम कोर्ट के नए फैसले की कमियां: एक विवादास्पद और चिंताजनक निर्णय

20 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने अरावली की परिभाषा को लेकर एक नया फैसला सुनाया जिसने पूरे वातावरण को चिंता में डाल दिया। इस फैसले में कोर्ट ने अब 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को अरावली का हिस्सा नहीं माना। यह फैसला सतह पर तो सकारात्मक दिख सकता है क्योंकि कोर्ट ने नई खनन लीज देने पर रोक लगाई है, लेकिन इसकी कमियां गहरी और खतरनाक हैं।​

फैसले की खतरनाक कमियां

90% अरावली संरक्षण से बाहर: वन सर्वेक्षण विभाग (FSI) की आंतरिक रिपोर्ट के अनुसार, 12,081 में से केवल 1,048 पहाड़ियां (8.7%) ही 100 मीटर की ऊंचाई को पूरा करती हैं। इसका मतलब है कि लगभग 90% अरावली क्षेत्र अब कानूनी संरक्षण से बाहर हो गया है। यह एक "मौत की वारंटी" जारी करने जैसा है जहां राज्य सरकारें इन कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को "राजस्व भूमि" घोषित कर सकती हैं और खनन की अनुमति दे सकती हैं।​

पर्यावरण विशेषज्ञों की चेतावनी: पर्यावरण विशेषज्ञ विमलेंदु झा ने कहा है कि यह निर्णय "अरावली के 90 प्रतिशत लुप्त होने का रास्ता खोल देता है।" हरियाणा में केवल 3.6% वन आवरण है, और इस नए नियम के तहत हरियाणा की अधिकांश अरावली पहाड़ियां संरक्षण खो देंगी। 30,000 हेक्टेयर वन भूमि की सुरक्षा खतरे में है।​​

अदालत की तर्कहीनता: कोर्ट ने कहा है कि "बेशक पूर्ण प्रतिबंध से अवैध खनन को बढ़ावा मिल सकता है," लेकिन इसके बजाय उसने खनन को कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों में कानूनी रूप से संभव बना दिया। यह तर्क विरोधाभासी है। अगर पूर्ण प्रतिबंध अवैध खनन को बढ़ावा देता है, तो आंशिक प्रतिबंध भी करेगा।​

हरियाणा के वन की कमी: हरियाणा के सेवानिवृत्त वन संरक्षक डॉ. आर.पी. बलवान ने कहा है कि हरियाणा की प्राकृतिक वन कवर केवल 3.6% है, जो देश में सबसे कम है। इस नए नियम के तहत, हरियाणा की अधिकांश अरावली पहाड़ियां, जो 100 मीटर से कम हैं, संरक्षित नहीं रहेंगी। यह तीन दशकों की न्यायिक सुरक्षा को पूरी तरह खत्म करने जैसा है।​

सुप्रीम कोर्ट की सकारात्मक दिशा

हालांकि, इस फैसले में कुछ सकारात्मक पहलू भी हैं। कोर्ट ने:

  1. नई खनन लीज पर अस्थायी रोक: जब तक "मैनेजमेंट प्लान फॉर सस्टेनेबल माइनिंग (MPSM)" तैयार नहीं हो जाता, तब तक कोई नई खनन लीज नहीं दी जाएगी।​

  2. पारिस्थितिकी संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान: कोर्ट ने प्राधिकारियों को खनन के लिए अनुमत क्षेत्रों, पारिस्थितिकी संवेदनशील क्षेत्रों, संरक्षण-महत्वपूर्ण क्षेत्रों और पुनरुद्धार प्राथमिकता वाले क्षेत्रों की पहचान करने का निर्देश दिया है।​

  3. थार रेगिस्तान को रोकने वाली ढाल: कोर्ट ने अरावली पारिस्थितिकी को "थार मरुस्थल के पूर्वी विस्तार को रोकने वाली प्रभावी ढाल" कहा है।​

लेकिन ये सकारात्मक निर्देश तभी काम आएंगे अगर सरकारें, राज्य और स्थानीय प्रशासन इन्हें ईमानदारी से लागू करें, जो पिछले सालों में नहीं हुआ है।​

भयावह परिणाम: अगर अरावली पूरी तरह खत्म हो जाए तो क्या होगा?
भूगोलीय और जलवायु संबंधी आपदा

अगर अरावली पूरी तरह से नष्ट हो गई, तो उत्तरपश्चिमी भारत के लिए यह भूगोलीय तबाही होगी। थार मरुस्थल 200 किलोमीटर पूर्व की ओर विस्तारित हो जाएगा और दिल्ली, हरियाणा, और राजस्थान के बड़े हिस्से रेगिस्तान में तब्दील हो जाएंगे। दिल्ली की जलवायु अर्ध-रेगिस्तानी परिस्थितियों में बदल जाएगी, जहां गर्मियां असहनीय हो जाएंगी और सर्दियां और भी कठोर।​

वर्षा के पैटर्न में भारी परिवर्तन होगा। मानसून बादलें उत्तर की ओर न जाकर पश्चिम की ओर चली जाएंगी, जिससे उत्तरी मैदान और हिमालय की तलहटी के क्षेत्रों को पानी नहीं मिलेगा। बांग्लादेश की खाड़ी और अरब सागर से आने वाली वर्षा के बादल बिना किसी बाधा के गुजर जाएंगे। इसके परिणामस्वरूप उत्तर भारत सूखे की स्थिति में चला जाएगा, जबकि कुछ क्षेत्रों में अचानक बाढ़ आएगी।​​

तापमान में भारी वृद्धि होगी। अरावली पहाड़ियां दिल्ली-एनसीआर के लिए प्राकृतिक शीतलन प्रणाली का काम करती हैं। इनके बिना, गर्मियों का तापमान 50-55 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है, जिससे जीवन असंभव हो जाएगा। शहर के "अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट" में तेजी से वृद्धि होगी।​

पानी का संकट: कुआं सूख गए तो क्या होगा?

भूजल का संकट सबसे गंभीर होगा। अरावली के बिना, वर्षा का पानी जमीन में नहीं जाएगा और सीधे बह जाएगा। दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा और राजस्थान में कोई पीने का पानी नहीं रहेगा। अभी ही 40% गांव "अंधेरे क्षेत्र" (dark zone) के रूप में वर्गीकृत किए जा चुके हैं, जहां भूजल समाप्त हो गया है। अरावली के नष्ट होने से यह संकट देश के बड़े हिस्सों तक फैल जाएगा।​

नदियां पूरी तरह सूख जाएंगी। बनास, लूनी, साहिबी, इंदौरी और साखी जैसी नदियां अभी ही खनन के कारण लगभग मर चुकी हैं। अरावली के पूर्ण विनाश से ये नदियां हमेशा के लिए सूख जाएंगी, और सदियों तक सिंचाई और जल आपूर्ति का कोई विकल्प नहीं होगा।​

जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाएं

धूल के तूफान और लू (गर्म हवाएं) की तीव्रता में भयानक वृद्धि होगी। 1980 से 2003 के बीच भारत में 9 घातक संवहनी तूफान आए थे जिनमें 640 लोगों की मृत्यु हुई, लेकिन 2003 से 2017 के बीच मात्र 14 वर्षों में 22 ऐसे तूफान आए, जिनमें 700 लोगों की जान गई। अरावली के नष्ट होने से ये आंकड़े गुणा हो जाएंगे।​

दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण असहनीय हो जाएगा। अरावली के वन हवा को शुद्ध करने वाले प्राकृतिक फिल्टर के रूप में कार्य करते हैं। इनके बिना, दिल्ली की हवा में PM2.5 और PM10 का स्तर आज की तुलना में कई गुना बढ़ जाएगा, जिससे श्वसन संबंधी बीमारियों में अभूतपूर्व वृद्धि होगी।​​

कृषि और खाद्य सुरक्षा में संकट

कृषि उत्पादन में भारी गिरावट होगी। अभी ही खनन और वन विनाश के कारण कृषि उत्पादन में 50% की गिरावट आई है। अरावली के पूर्ण विनाश से सिंचाई के लिए पानी न होने से खेती असंभव हो जाएगी। उत्तरपश्चिमी भारत का बड़ा हिस्सा भोजन उत्पादन के लिए असक्षम हो जाएगा, जिससे देश की खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी।​

ग्रामीण युवाओं का पलायन तेजी से बढ़ेगा। खेती अब आजीविका का विकल्प नहीं रहेगी। गांवों में बेरोजगारी, गरीबी, और सामाजिक समस्याएं बढ़ेंगी।​

वन्यजीव और जैव विविधता का विनाश

400+ देशी वनस्पति प्रजातियां, 200+ पक्षी प्रजातियां, और तेंदुए, लकड़बग्घे, सियार जैसे जानवर पूरी तरह विलुप्त हो जाएंगे। यह केवल जानवरों का विनाश नहीं होगा, बल्कि पूरी पारिस्थितिकी तंत्र का ढहना होगा।​

भूकंप का खतरा

अरावली की चट्टानें दिल्ली, जो भूकंप जोन में है, के लिए एक प्राकृतिक स्थिर करने वाली संरचना का काम करती हैं। इनके बिना, भूकंप की संभावना में भारी वृद्धि हो सकती है।​

अरावली को बचाने के तरीके: आशा की किरणें

हालांकि स्थिति गंभीर है, लेकिन अरावली को बचाना अभी भी संभव है। कुछ ठोस कदमों से हम इस विनाश को रोक सकते हैं:

सरकारी पहल: अरावली ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट

मार्च 2023 में, केंद्रीय सरकार ने अरावली ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट शुरू किया, जो एक बड़ी आशा की किरण है। इस परियोजना का उद्देश्य:

विशाल हरित बेल्ट: 5 किलोमीटर चौड़ी हरित बेल्ट का निर्माण, 6.45 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को कवर करते हुए।​

देशी प्रजातियों का रोपण: अर्जुन, धाऊ, खेजरी, पीपल और बरगद जैसी 50 मिलियन देशी वृक्ष प्रजातियों को लगाना। ये पेड़ पानी को बेहतर तरीके से अवशोषित करते हैं और स्थानीय जलवायु के अनुकूल होते हैं।​

जल संसाधनों का पुनरुद्धार: 75 जल निकायों (तालाब, झीलें, बावड़ियां) का पुनरुद्धार, जो वर्षा के पानी को संचित करें।​​

समुदाय की भागीदारी: 10,000 किसानों और स्वयं सहायता समूहों को वन वृक्षारोपण और सतत आजीविका में शामिल करना।​

तकनीकी निगरानी: उपग्रह मानचित्रण, जीआईएस (भौगोलिक सूचना प्रणाली) और ड्रोन तकनीक का उपयोग करके प्रगति को ट्रैक करना।​

कानूनी सुरक्षा

सुप्रीम कोर्ट के आदेश: हालांकि नए निर्णय में कमियां हैं, फिर भी कोर्ट ने खनन पर कुछ नियंत्रण रखे हैं। नई खनन लीज पर अस्थायी रोक एक महत्वपूर्ण कदम है।​

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT): NGT को अवैध खनन की शिकायतें मिलती हैं। अप्रैल 2025 में, NGT ने हरियाणा सरकार को सभी खनन और पत्थर कुचलने की गतिविधियों को अगस्त 2025 तक बंद करने का आदेश दिया।​

अंतर-राज्यीय समन्वय: दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात को अरावली की सुरक्षा के लिए एक समन्वित दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।​

कृत्रिम जल पुनर्भरण संरचनाएं

चेक डैम, बोरवेल रीचार्ज संरचनाएं, और अन्य कृत्रिम पुनर्भरण विधियों को लागू किया जा सकता है। अध्ययनों से पता चलता है कि चेक डैम से भूजल स्तर में 5 मीटर तक की वृद्धि हो सकती है (प्राकृतिक पुनर्भरण से केवल 1 मीटर)।​

पारंपरिक तरीकों को पुनः जीवंत करना

बावड़ियां, सीढ़ीदार कुएं, तालाब: ये पारंपरिक संरचनाएं फिर से बनाई जा सकती हैं। कई गांवों में महिला समूह और सामुदायिक संगठन इन परियोजनाओं को पहले से ही लागू कर रहे हैं।

स्थानीय समुदाय की भागीदारी

पेड़ों को लगाना और संरक्षित करना: गांववासियों को वृक्षारोपण कार्यक्रमों में शामिल करना। जब लोग अपनी जमीन पर पेड़ लगाते हैं, तो वे उसकी रक्षा भी करते हैं।

जागरूकता कार्यक्रम: स्कूलों, महाविद्यालयों और गांवों में अरावली के महत्व के बारे में जागरूकता फैलाई जानी चाहिए।

अरावली की विनाश यात्रा: कल और आज की तुलना | 

महिलाओं की भूमिका: महिलाएं जल संरक्षण और वन संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

निष्कर्ष: अरावली है जीवन, अरावली है भारत

अरावली पर्वतमाला सिर्फ एक भौगोलिक संरचना नहीं है। यह उत्तरपश्चिमी भारत के लाखों मनुष्यों की जलवायु, जल सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और भविष्य के अस्तित्व का आधार है। इसके 3.2 अरब वर्षों का भूवैज्ञानिक इतिहास, राजपूत साम्राज्यों के साथ इसका गहरा सांस्कृतिक जुड़ाव, इसकी अद्वितीय जल-संचय क्षमता और समृद्ध जैव विविधता इसे विश्व की एक अनोखी विरासत बनाती है।

लेकिन आज यह विरासत खनन, प्रदूषण, शहरीकरण और उपेक्षा के कारण गंभीर संकट में है। सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले में कमियां हैं, लेकिन हम हार नहीं मान सकते। हर नागरिक का दायित्व है कि वह:

  1. अवैध खनन की रिपोर्ट करे: जो भी खनन गतिविधि संदिग्ध हो, उसे NGT या स्थानीय प्रशासन को रिपोर्ट करें।

  2. जागरूकता फैलाए: अपने परिवार, दोस्तों और समुदाय को अरावली के महत्व के बारे में बताएं।

  3. सरकार पर दबाव डाले: नीति निर्माताओं से मांग करें कि वे सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को गंभीरता से लागू करें।

  4. वृक्षारोपण में भाग लें: अरावली ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट में स्वेच्छा से भाग लें।

  5. पानी को बचाएं: प्रत्येक बूंद पानी को बचाएं और उसका जिम्मेदारी से उपयोग करें।

यदि हम आज संरक्षण के लिए कदम नहीं उठाएंगे, तो भविष्य की पीढ़ियों को एक बंजर, प्यासा और प्रदूषित उत्तरपश्चिमी भारत का सामना करना पड़ेगा। अरावली केवल पत्थर और पेड़ों का एक समूह नहीं है - यह भारत की आत्मा है, जिसकी रक्षा करना हर नागरिक का दायित्व है।

हर एक पेड़ की बहाली, हर एक झरने को जीवंत करना, हर एक बूंद पानी को बचाना - ये सब अरावली को जीवनदान देने का कदम है। आइए, एक साथ आगे बढ़ें और इस महान पर्वत को बचाएं, क्योंकि अरावली बचेगी तो भारत बचेगा।

FAQ SECTION:

Q1: अरावली पर्वतमाला कहां स्थित है?

A: अरावली पर्वतमाला 700 किलोमीटर से अधिक लंबी है और गुजरात से दिल्ली तक फैली है। इसका 80% हिस्सा राजस्थान में है। इसे "राजस्थान की रीढ़" कहा जाता है।

Q2: अरावली कितनी पुरानी है?

A: अरावली पर्वतमाला 3.2 अरब साल पहले धरती पर उभरी थी, जिससे यह दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रेणियों में से एक है।

Q3: सुप्रीम कोर्ट के नए फैसले में क्या समस्या है?

A: कोर्ट ने 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को अरावली का हिस्सा नहीं माना। इससे 90% अरावली (FSI के अनुसार 12,081 में से 11,033 पहाड़ियां) कानूनी संरक्षण से बाहर हो गई है।

Q4: अरावली के नष्ट होने से क्या होगा?

A: थार रेगिस्तान 200 किलोमीटर पूर्व की ओर बढ़ेगा, दिल्ली रेगिस्तान बन जाएगी, भूजल समाप्त हो जाएगी, कृषि असंभव हो जाएगी, और 3 डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ेगा।

Q5: अभी तक कितनी पहाड़ियां नष्ट हो चुकी हैं?

A: सुप्रीम कोर्ट की नियुक्त समिति की 2018 रिपोर्ट के अनुसार, राजस्थान की 218 पहाड़ों में से 31 को पूरी तरह समतल कर दिया गया है।

Q6: अरावली को बचाने के लिए क्या किया जा रहा है?

A: सरकार ने अरावली ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट शुरू किया है, जिसमें 50 मिलियन पेड़ लगाए जाएंगे, 75 जल निकायों का पुनरुद्धार होगा, और समुदाय की भागीदारी होगी।

Q7: क्या मैं व्यक्तिगत रूप से अरावली को बचाने में मदद कर सकता हूं?

A: हां, आप अवैध खनन की रिपोर्ट कर सकते हैं, पेड़ लगा सकते हैं, पानी बचा सकते हैं, जागरूकता फैला सकते हैं, और सरकार पर दबाव डाल सकते हैं।

Q8: अरावली भूजल को कैसे पुनर्भरित करता है?

A: अरावली की झरझरी चट्टानें और प्राकृतिक दरारें वर्षा के पानी को गहराई तक रिसने देती हैं। प्रत्येक हेक्टेयर से 20 लाख लीटर वार्षिक भूजल पुनर्भरण संभव है।

Q9: खनन वर्तमान में किन राज्यों में सबसे अधिक हो रहा है?

A: राजस्थान, हरियाणा, और दिल्ली-एनसीआर क्षेत्रों में खनन सबसे ज्यादा हो रहा है।

Q10: अरावली ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट क्या है?

A: यह मार्च 2023 में शुरू किया गया एक परियोजना है जिसमें 6.45 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में 5 किलोमीटर चौड़ी हरित बेल्ट का निर्माण होगा, 50 मिलियन पेड़ लगाए जाएंगे, और 75 जल निकायों का पुनरुद्धार होगा।


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