पारस नगर का श्रापित कुआं - 42 भूखे बच्चों की आत्माएं | डरावनी सच्ची कहानी
परिचय:-
क्या आपने कभी ऐसी जगह के बारे में सुना है जहाँ पैसा और विकास की चाहत में लोग इतिहास को दफन कर देते हैं? पारस नगर का यह कहानी ठीक यही सच बताती है। 2020 में एक बड़ी कंपनी "सिखर ग्रुप" को एक smart city project मिला। शहर को बदलना था, लेकिन जो खुदाई हुई उससे कुछ ऐसा निकला जो 1920 से लोगों की आत्माओं को बेचैन किए हुए था। एक 50 फुट गहरा काला पत्थर का कुआं... जिसमें 42 भूखे बच्चों की लाशें दफन थीं। और जब भी सीमेंट हटाया गया, हर रात ठीक 2:15 बजे कुछ अजीब होने लगा। यह सिर्फ कहानी नहीं है - यह एक सच्चाई है जो हर रात दोहराई जाती है।
पारस नगर एक छोटा सा शहर जो अब एक स्मार्ट सिटी में बदलने जा रहा था।2020 में एक प्रोजेक्ट पास हुआ। जो सिखर ग्रुप नाम की एक बड़ी कंपनी ने लिया। अब शहर में बड़ी बड़ी बिल्डिंग बनना शुरू हो गयी।उन्हें इस बात की खबर भी नहीं कि ये बिल्डिंग किस बुनियाद पर खड़ी थी ।बस चारों तरफ़ कंस्ट्रक्शन का काम चालू।।अब इस शहर में वे एक स्मार्ट मॉल बनाना चाहते हैं?जिसके लिए उन्हें शहर के बीच में ही कम रेट में जमीन मिल गई।जब वे मॉल बनाने के लिए खुदाई शुरू करते हैं तो उन्हें वहाँ एक कुआं मिलता है।50 फिट गहरा और काले पत्थर से बना हुआ था। उसमें अजीब सी दुर्गंध आ रही थी।जब लेबर ने बिल्डर को यह बात बताईं तो? बिल्डर उस कुएं को सीमेंट से बंद करके मॉल का निर्माण शुरू करने के लिए कहता है।लगभग 2 साल में पांच मंजिला स्मार्ट और डिजिटल मॉल बन के तैयार हो गया। सभी शहरवासियों को लगा। ये मॉल शहर के लिए वरदान है।मॉल का उद्घाटन बड़े उत्साह के साथ हुआ। लोगों की काफी आवाजाही रही।फिरअचानक कुछ होने लगा। तीन महीने बाद 22 मई 2;15 बजे मॉल में कुछ अजीब हुआ।रात के 2:15 बजे वहाँ का सुरक्षा गार्ड रामसिंह मॉल की तीसरी मंजिल पर।गश्त लगा रहा था। अचानक वहाँ की सभी लाइटें बंद हो गई।यहाँ तक कि उसकी टॉर्च की लाइट भी बंद हो गई।उसने सोचा, टॉर्च की बैटरी खत्म हो गई होगी।अब।तीसरी मंजिल में पूरी तरह अंधेरा था। जैसे ही राम सिंह वापिस आने लगा।उसे पीछे से कुछ अजीब आवाज सुनाई दी। किसी के पैरों की आवाज़।लेकिन कदमों का पैटर्न कुछ अलग और अजीब था। डप,डप…….स्क्रीच ,स्क्रीच… ये आवाज किसी के चलने की नहीं रेंगने की लग रही थी। यह सुनकर रामसिंह इतना डर गए कि उसे हैं हार्ट अटैक से मौत हो गयी।रामसिंह के साथ क्या हुआ यह किसी को पता नहीं चला।और सब कुछ सामान्य चलने लगा।कुछ महीने बाद मॉल में भीड़ और पार्किंग की समस्या को देख कर। मॉल का मालिक।मॉल के नीचे एक सेलर मे पार्किंग स्पेस और एक हाई एंड रेस्टोरेंट बनाने की सोंची। काम शुरू, खुदाई होने लगी। लगभग चार पांच फुट खुदाई होने के बाद आज रौशनी के साथ कंपन… हुआ।यहकंपन इतना तेज था की पूरी बिल्डिंग हिल गयी। लोगों को लगा जैसे कोई भूकंप आया हो।लोग वहाँ से भागने लगे।तभी वहाँ एक इंजीनियर चिल्लाया यह कोई भूकंप नहीं बल्कि कुछ और है।यह कंपन नीचे और एक ही जगह पर है। उन्होंने खुदाई जारी रखी। कुछ फुट की खुदाई के बाद उन्होंने सीमेंट की एक परत मिली।ये वो ही परत थी, सिखर ग्रुप के बिल्डर ने बनाई थी।जब उसे तोड़ा गया तो वहाँ एक गहरा खोखला स्थान दिखा।जो एक कुआं था।सीमेंट से भरा गया था, अब वो सीमेंट उसमें सड़ने लगी थी।और उसमें से दुर्गंध आ रही थी। उसमें से कुछ हल्कीरौशनी के साथ धुआँ सा निकल रहा था।लेकिन यहाँ काम बंद नहीं हुआ।कुछ सप्ताह बाद रात के 2:15 बजे साइड का मुख्य इंजीनियर अमित कुमार अपने घर चला गया।और उसने अपने कमरे में जाते ही अपने सारे कपड़े हटा दिए।और कुछ बड़बड़ाने लगा।(यहाँ सब मारे जाएंगे) उसके परिवार ने उसे पागल समझ लिया और अस्पताल में भर्ती करवा दिया। लेकिन।वह शांति नहीं रह सकता था। हर रात 2:15 बजे वह ज़ोर ज़ोर से चिल्लाता।”वो मुझे देख रहा है।वो मेरे पैर पकड़ रहा है।मैं बोल रहा है बदला “ यहाँ सब मारे जाएंगे।उनके तीन हफ्ते बाद अमित कपड़े पहन कर अस्पताल की पांचवीं मंजिल की खिड़की से कूद गया।मॉल का मालिक इस बात को नजर अंदाज करते हुए।सेलर खोल दिया। नए कर्मचारियों को काम पर रखा।सेंटर खोलने के बाद प्रत्येक रात 2:15 बजे बिजली अपने आप बंद हो जाती, और अंधेरे में खरोचने की आवाज आती।वहाँ के कर्मचारी रात को पागलपन की हालत में निकलते।वहाँ पे किसी ना किसी किसी की मौत होने लगी।व्यक्ति के शरीर पर छोटे छोटे हाथों के निशान होते। 3 दिन बाद सेलर के हेड शेफ राजीव जिसकी उम्र 35 साल थी।उसकी नजरें थकी हुई और शून्य थी।बाहर आकर उसने सिर्फ एक ही बात कही।हमारे नीचे कोई है जो हमें खा रहा है।फिर वह गायब हो गया। 2 दिन बाद वह मोल के सेलर को एक कोने में मिला।उसके चारों ओर खून था।लेकिन उसे कोई गंभीर अच्छा।चोट नहीं लगी थी।बस उसके शरीर पर खरोंचों के निशान थे।ये निशान किसी जानवर के नहीं एक आदमी ने….. अपने नाखूनों से किये हो।ऐसे थे।जल्दी ही यह खबर।पूरे शहर में फैल गई।एक पत्रकार को यह है मामला रोचक लगा।उसने इस मामले की जांच की।खोजबीन के दौरान 1857 के दस्तावेजों से उसे पता चला। यहाँ एक भूखा कुआं है।उस कुएं में 42 लोग दफनहै।हर साल सर्दियों में ( नवंबर दिसंबर) जब जमीन ठंडी होती है।तो कुएं में दफन हुए व्यास लोग जीवित हो जाते।वे बहुत भूखे होते हैं।1927 में भारत की आजादी के समय कई लोग कुएँ में गिरकर मरने लगे। तो लोगों ने इस कुएं को श्रापित मानकर उसे सीमेंट से भर दिया।लेकिन किसी भी श्राप को आप सीमेंट से दफन नहीं कर सकते। शायद तभी सिखर ग्रुप के बिल्डर ने इसे दोबारा सीमेंट से भरना पड़ा। वे आत्माएं दफन नहीं होती, बस।इंतजार करती है बाहर आने का। और मौका मिलते ही वे हमारी दुनिया से जुड़ जाती है। पत्रकार ने जब इस कुएं की जांच की तो कुएं की दीवार पर 1920 लिखा था। ये कुआं1920 का था।जब पत्रकारों ने जांच की तो।उसे पता चला यहाँ 42 शिशुओ को दफन किया गया था।क्योंकि उस समय आकाल पढ़ा था और ये बच्चे बहुत भूखे थे, इनकी भूख जो खत्म नहीं होती थी।इन्हें भूख से मारा गया था।इस सच्चाई से अनजान मॉल के मालिक ने ये मॉल सार्वजनिक रूप से खोल रखा था।लेकिन किसको यह नहीं पता।रात के समय सेलर में क्या होता है?ये सब देखकर मॉल का मालिक गायब हो गया।पुलिस ने कुआं खोदने की कोशिश की।जैसे ही सीमेंट की परत हटाई।एक ठंडी और तेज हवा निकली।यह हवा इतनी तेज और ठंडी थी कि तीन मज़दूरों को अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा।अब मॉल का मालिक बदल चुका था।उसने मॉल में एक चेतावनी लगा दी।यह सिर रात को 10:00 बजे बन्द कर दिया जाएगा।रात के 2:15 बजे सभी दरवाजे अपना बंद और खुलने लगते।लेकिन उस समय सेलर में कोई नहीं होता था।लेकिन कुछ कर्मचारियों का कहना है की ऊपरी मंजिल पर बी 2:15 बजे के आसपास कुछ सुना जाता है।जैसे पैरों की आवाज़ लेकिन छोटे पैरों की।जो सीढ़ियों से ऊपर चढ़ रहे हो।पत्रकार ने अपने लेख में लिखा है।उन्हें भूख है और वे इंतज़ार कर रहे हैं वापस आने का और अपनी भूख मिटाने का जो कभी शांत नहीं होती।शायद ये सिलसिला ऐसे ही चलता रहेगा और इस श्राप से कभी मुक्ति नहीं मिलेगी।
FAQ:-
Q1: पारस नगर में यह घटनाएं कब शुरू हुईं?
2022 में जब स्मार्ट मॉल का निर्माण पूरा हुआ। लेकिन असली समस्या तब शुरू हुई जब मॉल के नीचे parking के लिए खुदाई की गई और सीमेंट की परत तोड़ी गई। तभी से हर रात 2:15 बजे घटनाएं दोहराई जाने लगीं।
Q2: कुआं में कितने लोग दफन थे?
कुल 42 शिशु/बच्चे। 1920 के भारतीय अकाल के समय जब भयंकर भूख पड़ी थी, तो इन बच्चों को भूख से मारा गया था और इन्हें इस कुएँ में दफन किया गया था।
Q3: 2:15 बजे क्यों घटनाएं होती हैं?
यह समय अभी तक रहस्य है। लेकिन कहा जाता है कि जब जमीन ठंडी होती है (नवंबर-दिसंबर), तो ये आत्माएं जीवित हो जाती हैं और भूख से तड़पती हैं। 2:15 बजे का कोई विशेष अर्थ हो सकता है जो अभी तक खोजा नहीं गया।
Q4: क्या यह सच में सच्ची घटना है?
हाँ। पत्रकारों ने 1857 के दस्तावेजों से इसकी पुष्टि की। कुएँ की दीवार पर 1920 लिखा था। हालांकि, सरकार ने इसे आधिकारिक रूप से मान्यता नहीं दी है।
Q5: मॉल को बंद किया गया है क्या?
नहीं। मॉल अभी भी चल रहा है। लेकिन नए मालिक ने रात 10:00 बजे मॉल को बंद करने का नियम बना दिया है। सेलर को रात 2:15 बजे के समय खुद ही दरवाजे खुलते-बंद होते हैं, भले ही कोई अंदर न हो।
Q6: इसे "श्रापित कुआं" क्यों कहते हैं?
क्योंकि 1920 में जब इन बच्चों को भूख से मारा गया था, तो उनकी आत्माएं बहुत दर्द में थीं। भूख कभी शांत नहीं होती - न तो शारीरिक भूख, न ही आत्मा की भूख। वह श्राप अभी भी जीवित है।
