बेरोजगारी, किसान आत्महत्या और धर्म की राजनीति : मुकेश की भावनात्मक कहानी | Indian System और Youth Crisis

बेरोजगारी, किसान आत्महत्या और धर्म की राजनीति : मुकेश की भावनात्मक कहानी | Indian System और Youth Crisis

परिचय:-

भारत जैसे विशाल और आध्यात्मिक देश में आज भी करोड़ों लोग बेरोजगारी, महंगाई, किसान आत्महत्या, गंदी राजनीति, प्रदूषण और कमजोर शिक्षा व्यवस्था के बीच जी रहे हैं। हर चुनाव में करोड़ों नौकरियों के वादे होते हैं, लेकिन हकीकत में लाखों युवा डिग्री लेकर भी भटकते रहते हैं। दूसरी तरफ, कर्ज में डूबे किसान बारिश और फसल पर निर्भर रहकर अपनी जान तक गंवा रहे हैं।  यह कहानी मुकेश जैसे एक होनहार, शिक्षित युवा की है, जो IIT से पढ़कर भी नौकरी के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहा है। उसके दोस्त विदेश चले गए, लेकिन मुकेश इस देश में रहकर संघर्ष कर रहा है। इसी बीच धर्म के नाम पर की गई राजनीति, शहर में लगा कर्फ्यू, किसान की आत्महत्या, दूषित पानी, गंदी हवा और महंगाई – सब मिलकर एक बड़े भारतीय संकट की तस्वीर बनाते हैं।  यह कहानी किसी धर्म या राजनीतिक पार्टी के समर्थन या विरोध में नहीं है, बल्कि यह उन असली मुद्दों – शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार, पर्यावरण और सिस्टम की नाकामियों – को सामने लाने की एक भावनात्मक कोशिश है, जो भारत को एक विकसित और सच में शिक्षित देश बनने से रोक रहे हैं।  मुकेश और दीपक की सोच में आया बदलाव, उनके द्वारा लिया गया प्रण, और आम नागरिक की जिम्मेदारी – यही इस कहानी का असली संदेश है।

बेरोजगारी, किसान आत्महत्या और धर्म की राजनीति : मुकेश की भावनात्मक कहानी | Indian System और Youth Crisis




एक  ऐसी कहानी जो भावनात्मक और फिक्शन पर आधारित है।जो धर्म और भारतीय संकट को छूती है। इस कहानी में हम किसी धर्म या राजनीत का समर्थन या विरोध नहीं कर रहे हैं। बस एक भारतीय संकट को उजागर करने का प्रयास कर रहे हैं जो भारत को उन्नत और शिक्षित होने से रोकती है।हमारे देश की व्यवस्था प्रणाली की वजह से ही आज के युवा और धनी आदमी देश से बाहर जा रहे हैं। मुकेश एक आइआइटी का होनहार स्टूडेंट।जो 3 साल से नौकरी के लिए भटक रहा था।उसके साथ के दोस्त जो पैसों का इंतजाम कर सकते थे, वे विदेश चले गए। उन्हें लगा इंडिया में  बेरोजगारी ही रहेगी। यहाँ रहकर हमें काम नहीं मिलेंगे।पैसा और नौकरी की तलाश में भी फॉरेन कंट्री चले जाते हैं।और मुकेश इंडिया में ही नौकरी की तलाश में भटक रहा था।जब भी चुनाव आते है सरकार 2,00,00,000 नौकरियों का वादा करती है।लेकिन हकीकत में वो अपने वादे को पूरा नहीं करती है। साल दर साल 70 से  80,00,000 युवा बेरोजगार हो जाते हैं।महंगाई और जिम्मेदारी उनके सपनों को मिट्टी में मिला देती है।घर चलाने के लिए एक पढ़ें लिखे नौजवानों को भी मजदूरी करनी पड़ती है।या पैसे कमाने के लिए वह अनैतिक चीजों से जुड़ जाता है।एक किसान। समय पर वर्षा न होने के कारण फसल खराब हो जाती है।लाखों रुपये के कर्ज से वो अकेले संघर्ष करता है।अगली फसल उगाने की तैयारी करना और घर की जिम्मेदारी समय पैरों में फसल के लिए न तो कोई सुविधा खाद या बीज मिल पाते हो और न ही लोन माफ़ होता है। सरकारी योजनाएं सिर्फ कागजों में रह जाती है।अगर मिलती भी है तो बहुत कम लोगों को मिलती है।कर्ज से तंग आकर कई किसान आत्महत्या तक कर लेते हैं।2023 मे 10,786  किसानों ने आत्महत्या की।  शिक्षा शिक्षा की भी उचित व्यवस्था नहीं है।गांव में तो स्कूल का बुनियादी ढांचा ही नहीं है। कहीं स्कूल की छत गिरती है तो कहीं दीवार।   कहीं कहीं पर तो टीचर ही नहीं।शहर में निजी स्कूलों की फीस बहुत ज्यादा है।जिसमें आम आदमी को अपने बच्चों को पढ़ाना मुश्किल हो जाता है।लेकिन सरकारी स्कूल की व्यवस्था देखकर।उन्हें कर्जा लेकर अपने बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ाना पड़ता है।जिस कारण घर में आर्थिक संकट उबलता है।आज के समय में तो पढ़ाई और कोर्स आम आदमी की पहुँच से बहुत आगे जा चुकें हैं।बहुत से माँ बाप अपने बच्चों को पढ़ा भी नहीं पाते।और कर्ज लेकर पढ़ाने का परिणाम कई बार सुसाइड तक पहुँच जाता है।ऐसा ही  कुछ मुकेश के साथ हो रहा था।उसको पढ़ाने में उसके पापा के सिर पे बहुत ज्यादा कर्ज हो गया।सोचा मुकेश नौकरी लग जायेगा तो कर्ज उतर जाएगा।पर बहुत कोशिश करने के बाद भी मुकेश को नौकरी नहीं मिल पा रही थी।और मुकेश का पाप है। उसने अपनी तरह मंजूर नहीं बनाना चाहते थे।एक मजदूर बनाने के लिए ही उसकी पढ़ाई भी इतना पैसा थोड़ी लगाया था।मुकेश का एक अच्छा दोस्त दीपक था।वो एक राजनीतिक पार्टी से जुड़ा हुआ था।उसे अच्छे खासे पैसे मिल जाते थे।जिससे उसके परिवार का गुज़ारा अच्छे से हो जाता था।एक बार वो अपना राजनीतिक करियर बनाने के लिए धर्म के ऊपर  भाषण दे रहा था।भाषण को सुन कर लोगों में एक दूसरे के धर्म को लेकर लड़ाई होने लगी। देखते ही देखते हालात कुछ ज्यादा ही बिगड़ गए।और शहर में कर्फ्यू लगाना पड़ा। मुकेश  का आज इंटरव्यू था, जो कर्फ्यू के कारण कैंसिल हो गया।से ही नौकरी का मौका भी निकल गया था।वो रात को छत पर सो रहा था।और आसमान की तरफ देख कर सोच रहा था।मुझे नौकरी मिलेगी या नहीं?वो अपनी बेबसी पर दुखी हो रहा था।और वो ज़ोर से चिल्ला करके कहना चाह रहा था।आज भी इस देश में बहुत से जरूरी मुददे है।फिर भी लोग धर्म को लेकर लड़ रहे है।पर इतने शोर में मेरी आवाज कौन सुनेगा?कौन लोगों की जरूरतों के बारे में समझेगा।आज भी हम अपने इतिहास को कोसते है। आने वाले भविष्य के निर्माण में पीछे रह जाते हैं। कहते है हमारा देश विकासशील है। 75 सालों से ही विकासशील है विकसित कब होगा?विकास के नाम से हमने सभी पहाड़ और जंगलों को साफ कर दिया है। हवा और पानी को दूषित कर दिया।विकासशील पथ  पर भी लोगों को काम नहीं मिल रहा। रोज़ बहुत ज्यादा संख्या में बेरोजगार हैं। और महंगाई अपने चरम पर पहुँच रही है।जो लोग पैसों का इंतजाम कर सकते हैं। वे फॉरेन कंट्री चले जाते हैं। कुछ  लोग यहाँ पर  पैसा कमाने के चक्कर में हर चीज़ में मिलावट कर देते हैं।यहाँ पर राजनीति तो सिर्फ धर्म के नाम पर होती। वास्तविक सच्चाई से तो किसी का लेना देना नहीं है, न मीडिया को नहीं, किसी राजनीतिक पार्टी को। कोई भी मूलभूत जरूरत और वैज्ञानिक तरीके से कोई चीज़ को सोचते ही नहीं है।किसी को कोई मतलब नहीं है और सांस लेने के लिए साफ हवा  तक नहीं है। लोगों को दमा और फेफड़ों का कैंसर होने लगा है।और फिर भी प्रगति के नाम पर पेड़ों और जंगलों को साफ किया जा रहा है। पीने के लिए साफ पानी तक नहीं है। नदी और नहरों का पानी तक दूषित हो गया है। उसमें भी फैक्टरियों द्वारा छोड़ा गयाकेमिकल मिक्स हो रहा है।जिस कारण पीने के लिए साफ पानी तक नहीं मिल पाता है।और खाने पीने की चीजों में मिलावट हो रही है।इसलिए रोकने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए जाते हैं।एक आम आदमी के लिए तो जैसे मौत और बिमारी हर तरफ से उसका इंतजार कर रही है।शुद्ध वायु मिल पर यह न साफ पानी और नहीं खाने के लिए भोजन।  क्या आम आदमी यहाँ सिर्फ मरने के लिए ही है।  क्या अब हमारी जरूरत नहीं कि हम हर चीज़ को वैज्ञानिक तरीके से समझे और आगे बढ़ें? हम कब तक धर्म की वजह से वैज्ञानिक दृष्टिकोण को नकारते रहेंगे।और वैसे भी इस देश में तो नदी, पहाड़, पेड़ सब की पूजा की जाती है फिर भी उसे  ही गंदा और खत्म किया जा रहा है। फिर हम धर्म की रक्षा कहाँ कर रहे हैं? या फिर धर्म सिर्फ मंदिर तक ही है?हमारे काम और हमारी जिम्मेदारी में नहीं।   हमें भी अपनी जिम्मेदारी इस देश के प्रति ईमानदारी से निभानी चाहिए। और इस देश को शिक्षित देश बनाना चाहिए।हर बच्चे को शिक्षा मिलनी चाहिए। शिक्षा के माध्यम से चीजों को आसानी से समझा जा सकता है।शिक्षा और हेल्थ वो का सबसे ज्यादा पैसा खर्च होता है।और वो अपनी रोज़ की जरूरतों को पूरा करने में लगा रहता है।देश के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को नकारता रहता है।अगर हाँ चीज़ सिस्टम के साथ हो तो हर व्यक्ति देश की प्रगति में अपना योगदान दे सकता है। फिर भी आज की शिक्षित और युवा पीढ़ी पर ये दामोदार ज्यादा पड़ता है की पर्यावरण और बेरोजगार जैसे समस्याओं के बारे में समझे?हर मुददे में हेल्थ, शिक्षा और रोजगार को सबसे पहले रखें।  देश के सभी नियमों का पालन करें।और देश की धरोहर को बचाए रखें। जब मुकेश को पता चलता है  धर्म को लेकर जो लड़ाई और कर्फ्यू लगा है वो उसके दोस्त दीपक के भाषण की वजह से हुआ है। यह सुनकर मुकेश को दुख हुआ।  दीपक जैसा पढ़ा लिखा युवा भी धर्म की राजनीति कर रहा है।वो भी गंभीर मुददे और जरूरतों के बारे में नहीं समझ पा रहा है।मुझे दीपक से बात करनी होगी।वो एक प्रभावशाली  लीडर है। लोग उसकी बातों को सुनते हैं और गंभीरता लेते हैं।  मुकेश दीपक से बात करता है।और उसे समझता है की लोगों को मौलिक ज़रूरतों के बारे में समझाना चाहिए।जैसे साफ पानी ,साफ हवा ,शुद्ध खाने पीने की चीजें और बेरोजगारी जैसी समस्या से उजागर करना चाहिए। कोई भी देश धर्म के नाम से तरक्की नहीं करता।वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपना से उन्नति करता है।और सभी नागरिक को अपनी जिम्मेदारी अच्छे से निभानी  चाहिये।कोई भी देश जितना विकसित दिखाई देता है, उसके पीछे वहाँ के नागरिक का भी हाथ होता है।हर नियम का पालन करते हैं।नेताओं और जनता साथ मिलकर कार्य करती है।वो भी आम जनता की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए।वे अपना निजी स्वार्थ पूरा नहीं करते।वे अपने देश को सबसे पहले रखते हैं।और हर जीवन की कीमत को समझते हैं। इस राह पर मुकेश  और दीपक साथ बढ़तेहै।और एक नए निर्माण का प्रण लेते हैं।जहाँ हर लोगों को रोजगार मिले।जहाँ पर्यावरण को विशेष महत्त्व  दिया जायेगा। और लोगों के हेल्थ के बारे में विशेष ध्यान रखा जाए।  हर कोई ताज़ी हवा में सांस ले ,को स्वच्छ पानी मिल सके और सबको बिना मिलावट का खाना मिल सके।जहा प्रगति के नाम पर पर्यावरण को नुकसान न पहुंचाया जाए। हर प्राचीन चीज़ और धरोहर को सहेज कर रखा जाए।और ये तभी संभव हो पाएगा जब हर इंसान शिक्षित होगा।    

FAQ:-

Q1. यह कहानी किस बारे में है?

यह कहानी भारत में बढ़ती बेरोजगारी, किसान आत्महत्या, महंगाई, धर्म की राजनीति, खराब शिक्षा व्यवस्था और प्रदूषण जैसे असली सामाजिक मुद्दों पर आधारित एक भावनात्मक और सामाजिक-यथार्थवादी फिक्शन है। इसमें मुकेश नाम के पढ़े-लिखे युवा के संघर्ष के ज़रिए सिस्टम की कड़वी सच्चाई दिखाई गई है।


Q2. क्या यह कहानी किसी धर्म या राजनीतिक पार्टी के पक्ष या विरोध में है?

नहीं। कहानी का मकसद किसी धर्म, पार्टी या विचारधारा का समर्थन या विरोध करना नहीं है। यह केवल इतना दिखाती है कि जब धर्म और राजनीति असली मुद्दों – जैसे नौकरी, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसान संकट और पर्यावरण – से ज़्यादा महत्वपूर्ण बना दिए जाते हैं, तो आम आदमी का जीवन और ज़्यादा मुश्किल हो जाता है।


Q3. कहानी का मुख्य संदेश क्या है?

कहानी का मुख्य संदेश है कि कोई भी देश धर्म के नाम पर नहीं, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण, शिक्षा, जागरूक नागरिकों और ईमानदार व्यवस्था के दम पर आगे बढ़ता है। हर नागरिक की जिम्मेदारी है कि वह सिस्टम से सवाल करे, नियमों का पालन करे, पर्यावरण की रक्षा करे और असली मुद्दों – साफ पानी, साफ हवा, शुद्ध भोजन, रोजगार और अच्छी शिक्षा – को प्राथमिकता दे।


Q4. मुकेश और दीपक के किरदार क्या दर्शाते हैं?

मुकेश उस शिक्षित भारतीय युवा का प्रतीक है जो मेहनत और शिक्षा के दम पर आगे बढ़ना चाहता है, लेकिन सिस्टम की खामियों और बेरोजगारी से जूझ रहा है। दीपक उस पढ़े-लिखे युवा की पहचान है जो अपनी काबिलियत धर्म की राजनीति में खो देता है। बाद में मुकेश की बात मानकर जब दीपक असली मुद्दों पर बोलना शुरू करता है, तो यह दिखाता है कि अगर सोच बदले तो युवा पीढ़ी देश को सच में बदल सकती है।


Q5. यह किस तरह की कहानी है – थ्रिलर, रोमांस, मोटिवेशन या कुछ और?

यह कहानी मुख्य रूप से सामाजिक-यथार्थवादी, भावनात्मक और मोटिवेशनल फिक्शन है। इसमें थ्रिलर या रोमांस नहीं, बल्कि रियल लाइफ से जुड़ी समस्याएँ, संघर्ष, जागरूकता और बदलाव की उम्मीद दिखाई गई है।


Q6. इस कहानी से पाठक क्या सीख सकता है?

पाठक यह समझ सकता है कि:

  • सिर्फ सरकार से उम्मीद करने के बजाय, हर नागरिक को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी।

  • धर्म, जाति और नफ़रत की राजनीति से हटकर, शिक्षा, हेल्थ, रोजगार और पर्यावरण जैसे मुद्दों पर बात करना ज़रूरी है।

  • अगर युवा पीढ़ी सच में जागरूक हो जाए, विज्ञान और तर्क को अपनाए, तो देश की दिशा बदली जा सकती है।

  • विकास का मतलब सिर्फ इमारतें और सड़कें नहीं, बल्कि स्वस्थ नागरिक, साफ पर्यावरण और न्यायपूर्ण व्यवस्था भी है।

                                               

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